इस समय इंसानों की सेहत पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है। दरअसल गंगा सफाई से निकले स्लज का सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) में पूरी तरह निस्तारण नहीं होने के कारण गंगा का कीचड़ खेतों तक पहुंचने लगा है।
अमर उजाला की एक रिपोर्ट्स बताती है कि गंगा को स्वच्छ बनाने के लिए बनाए गए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) अब एक नए पर्यावरणीय संकट का कारण बनते दिखाई दे रहे हैं। शहरों के सीवेज को शोधित कर गंगा में छोड़ने की प्रक्रिया के दौरान बड़ी मात्रा में निकलने वाला स्लज (कीचड़) उचित प्रबंधन के अभाव में खेतों तक पहुंच रहा है।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि इस पर तत्काल नियंत्रण नहीं किया गया तो इसका असर केवल मिट्टी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भूजल, फसलों और पूरी खाद्य श्रृंखला तक पहुंच सकता है।
खबर के मुताबिक़, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की ताजा रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि कई स्थानों पर इस स्लज में जिंक, कैडमियम और अन्य भारी धातुएं निर्धारित सीमा से अधिक पाई गईं, इसके बावजूद इसका उपयोग कृषि भूमि में किया गया।
गंगा संरक्षण परियोजनाओं का मूल्यांकन करते हुए सीएजी ने उत्तर प्रदेश के कई एसटीपी में स्लज प्रबंधन की गंभीर खामियां उजागर की हैं। इस मुद्दे से जुड़े पांच सबसे बड़े सवाल इस तरह हैं-
उत्तर प्रदेश के बाद अन्य गंगा राज्यों का व्यापक ऑडिट कब होगा?
एसटीपी पहले बने, सीवर नेटवर्क बाद में क्यों तैयार हुआ?
सीवेज की मात्रा और एसटीपी क्षमता का आकलन गलत कैसे हुआ?
बिना उपचारित सीवेज गंगा में छोड़ने वालों पर प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
भारी धातुओं वाला स्लज किसानों तक कैसे पहुंच गया?
खबर में बीते चार चार दशक में गंगा सफाई से संबंधित जो जानकारी प्रस्तुत की गई है उसपर एक नजर डालें तो पता चलता है-
1985 : गंगा एक्शन प्लान की शुरुआत
1993 : गंगा एक्शन प्लान (फेज-2) लागू
2009 : राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण का गठन
2014 : नमामि गंगे मिशन का शुभारंभ
2026 : सीएजी रिपोर्ट में एसटीपी, स्लज प्रबंधन और निगरानी की गंभीर खामियां उजागर
भविष्य में पहुंच सकता है नुकसान
रिपोर्ट से यह भी बात सामने आई है कि एसटीपी से निकलने वाले स्लज को कई जगह जैविक खाद के विकल्प के रूप में किसानों को उपलब्ध कराया गया। लेकिन परीक्षण में कुछ नमूनों में जिंक और कैडमियम जैसी भारी धातुओं का स्तर निर्धारित मानकों से अधिक पाया गया।
इस बारे में वैज्ञानिकों का मत है कि ऐसी धातुएं मिट्टी में वर्षों तक बनी रहती हैं। धीरे-धीरे ये फसलों की जड़ों के माध्यम से खाद्यान्न में पहुंच सकती हैं और अंतत मानव शरीर में प्रवेश कर दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकती हैं।