अमेठी में ‘करो या मरो’ का चुनाव, दो रानियों और एक वजीर के बीच मुकाबला

अमेठी : अमेठी की कहानी दो रानियों और एक वजीर के मुकाबले में सिमट कर रह गई है. अगर कोई विधान सभा खूब चर्चा में रही है, तो वो अमेठी है. Amethi

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राहुल गांधी की कर्मभूमि होने के नाते अमेठी को वीवीआईपी टैग मिला, पर धमक सिर्फ नाम तक सीमित रही.

अब अमेठी के 2 लाख 96 हजार वोटर अपना फैसला मतपेटियों में सील करेंगे.

जानिए ऐसे क्या फैक्टर हैं जिसके चलते हर एक प्रत्याशी के लिए यहां करो या मरो की स्थिति बन गई है.

सबसे पहले सपा के मंत्री और मुलायम सिंह के चहेते गायत्री प्रजापति के दिन अच्छे नहीं चल रहे, ये वो भी जान रहे हैं. विधायकी का चुनाव जैसे-तैसे लड़ कर उनको खुद पर कसते कानूनी शिकंजा से छुटकारा पाने के उपाय ढूंढने होंगे.

आपको बता दें खुद पर लगे गैंगरेप के आरोपों और एफआईआर के बाद एक रैली में वो मंच त्याग चुके हैं और गेंद जनता के पाले में डाल दी है.

कांग्रेस प्रत्याशी अमीता सिंह से ज्यादा उनके पति डॉक्टर संजय सिंह के लिए ये चुनाव जीतना जरूरी है. यहां के परिणाम दिल्ली में उनका कद तय करेंगे.

प्रियंका के करीबी माने जाने वाले डॉ संजय सिंह की पत्नी ने सबसे आखिरी दिन अपना नामांकन दाखिल किया, पर उनका प्रचार करने के लिए निजी कारणों के वजह से ही सही प्रियंका नहीं आ पाईं. कांग्रेस और सपा के गठबंधन की गांठ अमेठी में बुरी तरह फंस गई.

बीजेपी प्रत्याशी गरिमा सिंह के लिए ये लड़ाई सियासी कम पारिवारिक ज्यादा है. उनकी एंट्री ने इस अमेठी के चुनाव को फिल्मी हेडलाइन जरूर दे दी है.

सड़क बिजली पानी जैसे चुनावी मुद्दों की बजाए विरासत की सियासत भाषणों पर हावी है. ये भी सच है कि उनके लड़के अनंत विक्रम सिंह पहले खुद अपने लिए टिकट मांग रहे थे, पर भाजपा ने मां को टिकट देकर राजघराने के झगड़े को जनता के दरबार में लाकर खड़ा कर दिया है.

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