इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बंदरों के आतंक पर कड़ा रुख अपनाया

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गाजियाबाद में बंदरों के आतंक पर सुनवाई के दौरान सख्त रवैया अपनाया। कोर्ट ने प्रमुख सचिव से सवाल किया कि समस्या से निपटने के लिए क्या क़दम उठाए गए हैं।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बंदरों के आतंक पर कड़ा रुख अपनाया

प्रदेश के सभी ज़िलों में इस समय बंदरों का आतंक है। खासकर बंदरों द्वारा काटे जाने के मामलों में भी वृद्धि देखी गई है। इस समस्या को उठाते हुए याचिकाकर्ता का कहना है कि राज्य के लगभग सभी जिलों में लोग बंदरों से परेशान हैं। भोजन के अभाव में बंदर भूखे-प्यासे रह रहे हैं।

अदालत ने विभाग से बंदरों की समस्या से निपटने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी मांगी है। साथ ही यह भी पूछा है कि स्थानीय निकायों ने बंदरों की समस्या से निपटने के लिए क्या कदम उठाए हैं? कोर्ट ने उनसे इस संदर्भ में हलफनामा मांगा है।

हाईकोर्ट में पूर्व में दायर याचिका के आधार पर याचिकाकर्ताओं ने अदालत में कहा कि कौशांबी, प्रयागराज, सीतापुर, बरेली और आगरा समेत कई जिलों में बंदरों ने लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है। आगे उन्होंने फसलें बर्बाद होने, स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा चुनौती और कई स्थानों पर लोगों के डर कर घरों में कैद रहने की मजबूरी की बात कही है।

मामले में गाजियाबाद के डीएम द्वारा हलफनामा दाखिल कर बताया गया है कि 20 अगस्त को शहरी विकास विभाग व पर्यावरण विभाग को पत्र लिखकर गाइडलाइन और एसओपी तैयार करने की सिफारिश की जा चुकी है। सुनवाई पर अदालत ने सख्ती से कहा कि बैठकें की जा रही हैं और जिम्मेदारी को एक-दूसरे पर डाला जा रहा है। अदालत ने निकाय जनता की सुरक्षा की भी बात कही।

मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली एवं न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने विनीत शर्मा व अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए उपरोक्त आदेश दिया है। कोर्ट का कहना है कि बैठकें की जा रही हैं और इस जिम्मेदारी को एक दूसरे पर डाला जा रहा है। जबकि, निकायों का कर्तव्य है कि वे जनता की सुरक्षा सुनिश्चित करें। अदालत ने यह भी कहा कि नगर निकाय नगर विकास विभाग के अधीन हैं, इसलिए उन्हें भी मामले में पक्षकार बनाना उचित है।

जनता की सुरक्षा और सुविधा सुनिश्चित किए जाने के मामले में अदालत को बताया गया कि वन्यजीव संरक्षण अधिनियम से बंदरों को हटाए जाने के बाद, अब वे नगर निगमों और नगर पालिकाओं के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।

गौरतलब है कि याचिका में तत्काल कार्ययोजना, पशु चिकित्सालयों और बचाव वैन की व्यवस्था, बंदरों को जंगलों में पुनर्वास, भोजन की व्यवस्था के अलावा 24 घंटे हेल्पलाइन पोर्टल की स्थापना की मांग की है.

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