‘ग़ाज़ा में इज़रायल की कार्रवाइयाँ जनसंहार के दायरे में आती हैं।’ यह आरोप लगाया है संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद द्वारा नियुक्त वरिष्ठ स्वतंत्र विशेषज्ञों ने जबकि इज़रायल ने इन आरोपों को पूरी तरह निराधार बताते हुए ख़ारिज कर दिया है।

संयुक्त राष्ट्र के एक स्वतंत्र अन्तरराष्ट्रीय आयोग ने ग़ाज़ा शहर में तेज़ होती इज़रायली सैन्य कार्रवाई की पृष्ठभूमि में एक नई रिपोर्ट प्रकाशित की है। यह आयोग पूर्वी येरूशेलम और इसरायल समेत क़ब्ज़े वाले फ़लस्तीनी क्षेत्र की स्थिति की जाँच कर रहा है।
इस जाँच आयोग ने इज़रायल और सभी देशों से “जनसंहार को रोकने” और इसके लिए ज़िम्मेदारों को सज़ा देने के लिए अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के अन्तर्गत अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाने का आग्रह किया गया है।
आयोग की अध्यक्ष नवी पिल्लै संबंध में कहना है- “आयोग का निष्कर्ष है कि ग़ाज़ा में जनसंहार के लिए इसराइल ज़िम्मेदार है। यह स्पष्ट दिखाई देता है कि उसकी मंशा ग़ाज़ा के फ़लस्तीनियों को नष्ट करने की है, और यह उन कार्यों के ज़रिए किया जा रहा है जो जनसंहार कन्वेंशन में निर्धारित हैं।”
दूसरी तरफ इन आरोपों पर यूएन जिनीवा में इज़रायल के राजदूत डैनी हेनॉन के मुताबिक़, रिपोर्ट में इज़रायल पर जनसंहार की मंशा का आरोप निराधार है और इसे सिद्ध नहीं किया जा सकता। उन्होंने ने जाँच आयोग के निष्कर्षों को पूरी तरह से ख़ारिज कर दिया। उनका कहना है कि 70 से अधिक पृष्ठों की यह रिपोर्ट “चुनिन्दा तथ्यों पर आधारित” है, जो हमास और उसके समर्थकों के कथानक को बढ़ावा देती है और इज़रायल को बदनाम करने की कोशिश करती है।
मंगलवार को आयोग की अध्यक्ष नवी पिल्लै और सदस्य क्रिस सिडोटी ने जिनीवा में आयोजित एक पत्रकार सम्मेलन में जानकारी दी कि ग़ाज़ा युद्ध की उनकी जाँच, 7 अक्टूबर 2023 को इसराइल में हुए हमास-नेतृत्व वाले आतंकी हमलों से शुरू हुई थी। बताते चलें कि नवी पिल्लै और क्रिस सिडोटी संयुक्त राष्ट्र के कर्मचारी नहीं हैं। उन्हें मानवाधिकार परिषद के 47 सदस्य देशों द्वारा नियुक्त किया गया है।
अध्यक्ष नवी पिल्लै और सदस्य क्रिस सिडोटी ने बताया कि आयोग की जाँच का निष्कर्ष यह रहा कि इज़रायली अधिकारी और सुरक्षा बल, 1948 के जनसंहार रोकथाम एवं दंड कन्वेंशन में परिभाषित पाँच में से चार जनसंहारक कृत्यों” को अंजाम देने के लिए ज़िम्मेदार हैं। उनके मुताबक ये कृत्य-
• हत्या करना,
• गम्भीर शारीरिक या मानसिक क्षति पहुँचाना,
• फ़लस्तीनियों के विनाश के लिए जानबूझकर ऐसे हालात पैदा करना, जिससे उनका अस्तित्व असम्भव हो जाए, और
• जन्म रोकने के उद्देश्य से उपाय लागू करना हैं।
नवी पिल्लै ने कहा कि इन अत्याचार अपराधों की ज़िम्मेदारी “सर्वोच्च स्तर पर बैठे इज़रायली अधिकारियों पर” है। आगे उन्होंने यह भी बताया कि इज़रायली नागरिक और सैन्य अधिकारियों ने फ़लस्तीनियों को अपमानित करने वाले “स्पष्ट और मुखर बयान” दिए हैं।
आयोग ने ग़ाज़ा में इज़रायली अधिकारियों और सुरक्षा बलों की गतिविधियों का अध्ययन करने के बाद इस पैनल ने कहा- “इसमें ग़ाज़ा में फ़लस्तीनियों पर भुखमरी व अमानवीय जीवन परिस्थितियाँ थोपना शामिल है… उनकी सैन्य कार्रवाई की प्रकृति से यही एक तार्किक निष्कर्ष निकलता है कि यह जनसंहार की मंशा के तहत किया गया।”
संयुक्त राष्ट्र की राहत समन्वय एजेंसी ओसीएचए के अनुसार, ग़ाज़ा शहर में अब भी लगभग दस लाख लोग रह रहे हैं। वहाँ अकाल की स्थिति की आधिकारिक पुष्टि हो चुकी है। लोग रोज़ाना बमबारी के शिकार हो रहे हैं और “इसराइली सेना द्वारा पूरे शहर को विस्थापन आदेश दिए जाने के बाद, जीवन-निर्वाह के साधनों तक उनकी पहुँच गम्भीर रूप से बाधित हो गई है।”
जाँच आयोग ने बच्चों को “सीधे निशाना बनाए जाने” और इसराइल द्वारा अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) के आदेशों की अवहेलना की भी समीक्षा की। अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय ने मार्च 2024 में आदेश दिया था कि इज़रायल को “ग़ाज़ा में फ़लस्तीनियों को ज़रूरी बुनियादी सेवाएँ एवं मानवीय सहायता बड़े पैमाने पर, और बिना किसी बाधा के उपलब्ध कराने के लिए सभी ज़रूरी एवं प्रभावी क़दम उठाने चाहिए।”
नवी पिल्लै ने ज़ोर देते हुए कहा- “सभी देशों की क़ानूनी ज़िम्मेदारी है कि वे जनसंहार को रोकने के लिए अपने पास मौजूद हर व्यावहारिक साधन का उपयोग करें।”













