छत पर लगे सौर पैनलों का नियमित रखरखाव क्यों ज़रूरी है

एक हालिया अध्ययन में पाया गया कि छत पर सौर पैनल लगाने वाले आधे उपयोगकर्ता ही दैनिक रूप से सिस्टम के प्रदर्शन की निगरानी करते हैं और दो-तिहाई उपयोगकर्ता कम से कम महीने में एक बार अपने पैनलों की सफाई करते हैं। इस तरह की लापवाही नेट-ज़ीरो लक्ष्यों से जुड़े लक्ष्य में रुकावट का कारण बन सकता है।

छत पर लगे सौर पैनलों का नियमित रखरखाव बेहद ज़रूरी है। एक रिपोर्ट के अनुसार, ऊर्जा, पर्यावरण और जल परिषद (CEEW) द्वारा किए गए एक हालिया अध्ययन में पाया गया कि छत पर सौर पैनल लगाने वाले आधे उपयोगकर्ता ही दैनिक रूप से सिस्टम के प्रदर्शन की निगरानी करते हैं और दो-तिहाई उपयोगकर्ता कम से कम महीने में एक बार अपने पैनलों की सफाई करते हैं।

छत पर लगे सौर पैनलों के सामने आने वाली बाधा पर नज़र हैं कि जमा हुई धूल की परतें, पक्षियों की बीट और उपकरणों की खराबी इसकी दक्षता को काफी कम कर सकती हैं।

हालांकि मौजूदा पॉलिसी RTS सिस्टम के लिए पांच साल का फ्री मेंटेनेंस सपोर्ट ज़रूरी बनाती है , लेकिन फ्री सर्विस का स्कोप साफ तौर पर तय नहीं है। इस वजह से, इस दौरान दिया जाने वाला सपोर्ट अक्सर उम्मीदों से अलग होता है।

सीईईडब्ल्यू की हालिया रिपोर्ट बताती है कि मेंटेनेंस का खर्च आमतौर पर इंस्टॉलेशन के खर्च में ही शामिल होता है और मेंटेनेंस के हिस्से के तौर पर क्लीनिंग सर्विस का कोई साफ ज़िक्र नहीं होता है। आरटीएस डेवलपर्स महीने में एक बार से लेकर साल में एक बार तक विज़िट करते हैं, और ये विज़िट अक्सर प्रोएक्टिव होने के बजाय रिएक्टिव होती हैं, जिससे पता चलता है कि मेंटेनेंस मुख्य रूप से कस्टमर के कहने पर किया जाता है, न कि तय विज़िट के मुताबिक़।

रिपोर्ट के अनुसार, इस तरह के अनियमित मेंटेनेंस के नतीजे सिर्फ़ कंज्यूमर तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि इसका असर पूरे इकोसिस्टम पर पड़ता है। हालांकि मौजूदा पॉलिसी RTS सिस्टम के लिए पांच साल का फ्री मेंटेनेंस सपोर्ट ज़रूरी बनाती है , लेकिन फ्री सर्विस का स्कोप साफ तौर पर तय नहीं है। इस वजह से, इस दौरान दिया जाने वाला सपोर्ट अक्सर उम्मीदों से अलग होता है।

मेंटेनेंस के गलत तरीकों से उम्मीद और असल बिजली के प्रोडक्शन में बड़ा अंतर आ सकता है, जिससे एनर्जी का अनुमान और शेड्यूलिंग गलत हो सकती है। रिपोर्ट बताती है कि हर खराब परफ़ॉर्मेंस वाला सिस्टम सरकारी सब्सिडी का असर कम करता है और इससे तय फ़ायदों का 80 परसेंट तक पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाता है।

इसके अलावा लगातार खराब परफ़ॉर्मेंस से RTS सिस्टम का लाइफ़टाइम एनर्जी प्रोडक्शन कम हो जाता है। इससे मुफ़्त बिजली योजना के तहत 720 मिलियन टन CO₂ एमिशन से बचने का सरकार का टारगेट कमज़ोर हो सकता है और भारत के लंबे समय के नेट-ज़ीरो लक्ष्यों की तरफ़ तरक्की में रुकावट आ सकती है।

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