आप वर्तमान पल में खुद को कितना जुड़ा हुआ महसूस करते हैं? शायद जितना आप सोचते हैं, उससे थोड़ा कम। साइंस अलर्ट की रिपोर्ट इस विषय पर प्रकाश डालती है।
जब आप इन शब्दों को पढ़ने के लिए अपने सामने मौजूद स्क्रीन पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तब भी आपका दिमाग उन चीज़ों के बीच लगातार बदलता रहता है जिन्हें आप होशपूर्वक देख रहे हैं, और उन अन्य दृश्य जानकारियों के बीच, जो कभी आपकी चेतना तक पहुँच ही नहीं पातीं।
मकाक बंदरों और इंसानों पर की गई एक नई प्रीप्रिंट स्टडी से पता चलता है कि हमारा दिमाग एक सेकंड में लगभग 15 बार सचेत (कॉन्शियस) और अचेत (अनकॉन्शियस) जानकारियों के बीच स्विच करता रहता है। इससे एक दिलचस्प संभावना पैदा होती है कि दुनिया के बारे में हमारे सचेत अनुभवों को केवल दृश्य जानकारी ही नहीं, बल्कि कुछ और भी नियंत्रित कर रहा है।
यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले के न्यूरोसाइंटिस्ट्स जेनिस हेसे और डोरिस त्साओ की अगुवाई वाली टीम लिखती है, ‘किसी भी पल, दिमाग की गतिविधियों का केवल एक हिस्सा ही हमारी चेतना तक पहुँचता है, जबकि बाकी हिस्सा बिना हमारे अनुभव में आए ही प्रोसेस हो जाता है। यह बंटवारा कैसे होता है, यह न्यूरोसाइंस की सबसे बुनियादी अनसुलझी समस्याओं में से एक है।’
हमारे शरीर में कई ऐसी चीज़ें हैं जो अपने आप (ऑटोमैटिकली) होती रहती हैं, और चीज़ों को महसूस करना (सेंसिंग) भी उन्हीं में से एक है। हम लगातार कई तरह की सेंसरी जानकारियों (इंद्रियों से मिलने वाली सूचनाओं) के बीच रहते हैं, और इन जानकारियों को ग्रहण करने की अपनी क्षमता को हम चाहकर भी बंद नहीं कर सकते।
लंबे समय से जानकार इस सवाल का जवाब तलाश रहे थे कि ब्रेन में मौजूद अनगिनत जानकारी में से कुछ होश तक क्यों पहुंचती हैं जबकि बाकी सबकॉन्शियस लेवल पर प्रोसेस होती हैं। रिसर्च से मिली जानकारी के नतीजे बताते हैं कि दिमाग, होश में और अनजाने में देखी गई विज़ुअल जानकारी के रिप्रेजेंटेशन के बीच बहुत तेज़ी से स्विच करता है।
हालाँकि हासिल नतीजे अभी ठोस नतीजे नहीं देते लेकिन मिली जानकारी के अनुसार, रिसर्च के नतीजों के मुताबिक, दिमाग की कुछ एक्टिविटीज़ एक सेकंड में लगभग 15 बार होश में और अनजाने में देखी गई विज़ुअल जानकारी के बीच स्विच कर सकती हैं। हालाँकि, इसका मतलब यह नहीं है कि इंसान हर सेकंड 15 बार अपनी देखी गई असलियत बदलते हैं, बल्कि दिमाग की एक्टिविटी में यह बदलाव देखा गया है।
रिसर्चर्स ने इस स्टडी के लिए ‘बाइनोकुलर फ़्लैश सप्रेशन’ नाम का एक तरीका इस्तेमाल किया, जिसमें एक आँख को एक चेहरा दिखाया जाता है और फिर अचानक दूसरी आँख को दूसरा चेहरा दिखाया जाता है। आमतौर पर, नया दिखाया गया चेहरा होश में आने पर हावी रहता है, जबकि पहली इमेज होश से गायब हो जाती है, भले ही वह आंख के सामने मौजूद हो।
हैरानी की बात है कि न्यूरल एक्टिविटी इन दोनों पैटर्न के बीच लगभग हर 60 से 70 मिलीसेकंड में बदलती रही, इस तरह ब्रेन में दिखने वाली और अनजाने में दिखने वाली इमेज का रिप्रेजेंटेशन बदलता रहा, हालांकि होश में देखी गई इमेज का रिप्रेजेंटेशन तुलनात्मक रूप से ज़्यादा मज़बूत था।
लेकिन इससे एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है: हमारा दिमाग कैसे तय करता है कि कौन सी जानकारी हमारे सचेत अनुभव का हिस्सा बनेगी, और कौन सी जानकारी हमारी चेतना से छिपी रहेगी?
इसके जवाब खोजने के लिए, न्यूरोसाइंटिस्ट्स ने दशकों तक इस बात का अध्ययन किया कि जब हम किसी चीज़ को होशपूर्वक महसूस करते हैं, तो दिमाग के कौन से हिस्से सक्रिय होते हैं। लेकिन समय के साथ एक समस्या सामने आई: दिमाग के वही हिस्से अचेत (अनकॉन्शियस) उत्तेजनाओं (स्टिम्युलाई) पर भी प्रतिक्रिया दे सकते हैं।
हेसे और उनके साथियों ने एक नया सवाल उठाया। क्या ऐसा हो सकता है कि अब तक की खोजें किसी गलत दिशा या आयाम पर केंद्रित रही हों? क्या हो अगर इसका जवाब जगह में नहीं, बल्कि समय में छिपा हो?
दूसरे शब्दों में, उनका मानना था कि समय के साथ मस्तिष्क की गतिविधि में होने वाले बदलावों से इस बात के संकेत मिल सकते हैं कि मस्तिष्क सचेत और अचेत दृश्य जानकारी को कैसे संभालता है।
उनका शोध मैकाक (एक प्रकार के बंदर) पर केंद्रित था। ये मैकाक ‘एनाग्लिफ’ चश्मा पहने हुए थे। रिसर्च करने वालों का कहना है कि रिसर्च की कुछ ज़रूरी कमियां हैं, एक्सपेरिमेंट सिर्फ़ 2 बंदरों पर किए गए, जबकि बंदर खुद नहीं बता पाए कि वे होश में क्या देख रहे थे। इसके अलावा, रिसर्च अभी तक पीयर रिव्यू स्टेज से नहीं गुज़री है, इसलिए नतीजों को पक्का सबूत के बजाय शुरुआती साइंटिफिक सबूत माना जाना चाहिए।