दुनिया भर में लगभग 77 करोड़ लोग, यानि हर 10 में से क़रीब एक व्यक्ति, ऐसे इलाक़ों में रहते हैं जो समुद्र में ऊँचे ज्वार के स्तर से पाँच मीटर से भी कम ऊँचाई पर हैं।
इतिहास में दर्ज किसी भी समय की तुलना में अब महासागर का स्तर अधिक तेज़ी से बढ़ रहा है। इसके प्रभाव अभी से महसूस किए जा रहे हैं और ख़तरे लगातार बढ़ रहे हैं। इस संकट से विकसित एवं विकासशील, दोनों तरह के देश प्रभावित हो रहे हैं और दुनिया का शायद ही कोई हिस्सा इससे पूरी तरह अछूता है।
समुद्र-स्तर की इस बढ़ोत्तरी का असर केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है। इसका मानवाधिकारों, आर्थिक विकास, स्वास्थ्य, संस्कृति, अनेक देशों के भविष्य और बुनियादी मानवीय गरिमा पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है।
यही कारण है कि आज दुनियाभर में ज़मीन के बड़े हिस्से पानी में डूब रहे हैं, घरों में बाढ़ का पानी पहुंचना आम बात बनती जा रही है। और इन सबके बीच लोगों की आजीविका छिन रही है। यह हालात सुरक्षित भविष्य की तलाश में जुटे लोगों के लिए मुश्किलें बढ़ा रहे हैं।
यूएन मीडिया रिपोर्ट्स का कहना है कि मानव गतिविधियों से पैदा हुए जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र का स्तर लगातार बढ़ रहा है। बढ़ता समुद्र-स्तर आने वाली पीढ़ियों के लिए गम्भीर संकट बनेगा या एक ऐसी चुनौती जिससे निपटा जा सके, यह आज कार्रवाई करने और बदलती परिस्थितियों के अनुरूप ढलने की हमारी क्षमता पर निर्भर करेगा।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2014 से 2023 के बीच वैश्विक समुद्र-स्तर में औसतन 4.7 मिलीमीटर प्रति वर्ष की वृद्धि हुई। साल 2024 में यह दर रिकॉर्ड 5.9 मिलीमीटर तक पहुँच गई।
रिपोर्ट बताती है कि सबसे आशावादी अनुमान के तहत भी, वर्ष 2100 तक समुद्र-स्तर में लगभग 0.55 मीटर तक की बढ़ोत्तरी हो सकती है। सबसे ख़राब स्थिति में यह बढ़ोत्तरी एक मीटर से अधिक हो सकती है। वहीं, अत्यधिक उत्सर्जन वाले परिदृश्य में इस सदी के अन्त तक समुद्र-स्तर में लगभग 2 मीटर तक की बढ़ोत्तरी की सम्भावना कम है, लेकिन यदि ऐसा हुआ तो इसके प्रभाव बेहद गम्भीर हो सकते हैं।
अब सवाल सामने आता है कि समुद्र-स्तर क्यों बढ़ रहा है? इसका जवाब है कि हिमनदों और विशाल हिम-चादरों के पिघलने से ऐसा हो रहा है। दरअसल महासागर गर्म होने पर समुद्री पानी फैलता है और अधिक जगह घेरता है, जिससे समुद्र-स्तर बढ़ता है।
रिपोर्ट बताती है कि पृथ्वी पर जमा हो रही अतिरिक्त गर्मी का लगभग 91 प्रतिशत महासागर सोख रहे हैं। इसलिए, हानिकारक गैसों के बढ़ते उत्सर्जन से जैसे-जैसे पृथ्वी गर्म हो रही है, समुद्र-स्तर में आगे और बढ़ोत्तरी होना लगभग तय है। दुनिया भर में लगभग 77 करोड़ लोग, यानि हर 10 में से क़रीब एक व्यक्ति, ऐसे इलाक़ों में रहते हैं जो समुद्र में ऊँचे ज्वार के स्तर से पाँच मीटर से भी कम ऊँचाई पर हैं।
समुद्र के इतने क़रीब रहने के असर अब साफ़ दिखाई देने लगे हैं। एक ओर मीठे पानी के कुओं और खेती की ज़मीन में खारापन बढ़ रहा है वहीँ बाढ़ से अस्पतालों, स्कूलों और स्वच्छता प्रणालियों को नुक़सान पहुँच रहा है। ऐसे में पानी से फैलने वाली बीमारियों का ख़तरा बढ़ रहा है, जिससे पेयजल आपूर्ति पर असर पड़ रहा है और लोगों में मानसिक तनाव भी बढ़ रहा है। मत्स्य पालन और पर्यटन जैसे कारोबार भी इससे प्रभावित हुए हैं।
गौरतलब है कि विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन के असर से निपटने के लिए हर साल लगभग 310 से 365 अरब डॉलर की ज़रूरत है, जबकि 2023 में इसके लिए वैश्विक स्तर पर केवल 26 अरब डॉलर की वित्तीय सहायता उपलब्ध थी।
इन परिस्थितियों से सबसे अधिक ख़तरे वाले इलाक़े की बात करें तो निचले इलाक़ों में बसे डेल्टा शहर इसकी परिधि में आते हैं। इनमें ढाका, मुम्बई व कोलकाता जैसे शहरों में 1.4 करोड़ से अधिक लोगों के घर, आजीविका और जीवन ख़तरे में हैं।
वहीँ प्रशान्त क्षेत्र के कुछ देशों में स्थानीय समुद्र-स्तर वैश्विक औसत की तुलना में दोगुनी से भी अधिक तेज़ी से बढ़ रहा है। बार-बार आने वाली बाढ़ के कारण ये देश विशेष रूप से संवेदनशील हैं। जबकि तटीय महानगर जिनमें मियामी, न्यूयॉर्क और ग्वांगझोउ जैसे शहरों में बुनियादी ढाँचे को भारी क्षति से ख़रबों डॉलरों का आर्थिक नुक़सान हो सकता है।