आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस डॉक्टर, हीलर और वेलनेस इन्फ्लुएंसर सोशल मीडिया पर सप्लीमेंट्स के विज्ञापन की बदौलत गुमराह करने वाले दावों से मुनाफ़ा कमाते पाए गए हैं। इन वीडियो में आर्टिफिशियल चेहरे, आवाज़ें और नकली मेडिकल माहौल का इस्तेमाल किया जाता है, जबकि कुछ विज्ञापन तो वज़न घटाने, दर्द और दूसरी बीमारियों में मदद करने का दावा भी करते हैं।
सोशल मीडिया पर डॉक्टर दिखने वाला हर कोई डॉक्टर नहीं होता, और सोशल मीडिया पर हर दावा, चाहे वह वज़न कम करने, मसल्स बनाने, ब्यूटी टिप्स देने या किसी बीमारी का इलाज करने के बारे में हो, भरोसेमंद नहीं होता। रिसर्च से पता चला है कि एआई अकाउंट्स सोशल मीडिया पर गलत हेल्थ सलाह फैलाकर लाखों व्यूज़ पा रहे हैं।
न्यूयॉर्क टाइम्स की एक इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट के मुताबिक, सोशल मीडिया पर ऐसे सैकड़ों एआई से बने डॉक्टर, हीलर और वेलनेस इन्फ्लुएंसर सामने आए हैं, जो सप्लीमेंट्स का विज्ञापन करते हुए गुमराह करने वाले हेल्थ दावे कर रहे हैं और उनसे मुनाफ़ा कमा रहे हैं।
इस बारे में एक्सपर्ट्स ने चेतावनी दी है कि ऑनलाइन गलत हेल्थ दावे “लोगों की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा” हैं। रिसर्च से पता चला है कि एआई से बने डॉक्टर टिकटॉक पर गलत हेल्थ सलाह फैलाकर लाखों व्यूज़ पा रहे हैं।
ब्रिटिश मेडिकल एसोसिएशन काउंसिल की डिप्टी चेयर, डॉ. एम्मा रन्सविक ने उन एआई अकाउंट्स से होने वाले खतरों की ओर इशारा किया जो “मेडिकल से जुड़ी गलत बातें फैलाते हैं और तथाकथित चमत्कारी इलाज को बढ़ावा देते हैं”।
उन्होंने कहा, “टिकटॉक जैसे प्लेटफॉर्म को खतरनाक और नकली मेडिकल सलाह को रोकने के लिए और कदम उठाने चाहिए… वरना, लोगों को अपनी सेहत और शायद अपनी जान देकर इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है।”
रिसर्च में पाया गया कि हेल्थ से जुड़े टॉप टिकटॉक वीडियो में से 40 प्रतिशत में एआई से बना कंटेंट था। इनमें से ज़्यादातर वीडियो ऐसे डीपफेक इन्फ्लुएंसर अकाउंट्स ने पोस्ट किए थे जो असली डॉक्टरों जैसे दिखते थे। कुछ खास सर्च शब्दों, जैसे “हेल्थ टिप्स”, के लिए 84 प्रतिशत वीडियो एआई से बने या एआई की मदद से बने कंटेंट की श्रेणी में आते थे।
यह रिसर्च इस महीने डिजिटल मार्केटिंग एजेंसी ‘हैलम’ (digital marketing agency Hallam) ने पब्लिश की थी। इससे पहले एनएचएस ने चेतावनी दी थी कि सोशल मीडिया पर हेल्थ से जुड़ी गलत जानकारी “जन-स्वास्थ्य के लिए एक वास्तविक खतरा” है।
हैलम के अनुसार, उनकी सर्च में एआई से बने टॉप डॉक्टर और हेल्थ वीडियो को औसतन 25 लाख (2.5 मिलियन) व्यूज़ मिले। टिकटॉक ने उन वीडियो के उदाहरण हटा दिए जो ‘द गार्डियन’ ने प्लेटफॉर्म को भेजे थे।
अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के मुताबिक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से बने डॉक्टर, हीलर और वेलनेस इन्फ्लुएंसर सोशल मीडिया पर सप्लीमेंट्स का विज्ञापन कर रहे हैं, जिनमें से ज़्यादातर इन्फ्लुएंसर गुमराह करने वाले दावों से मुनाफ़ा कमाते पाए गए हैं।
इन वीडियो में आर्टिफिशियल चेहरे, आवाज़ें और नकली मेडिकल माहौल का इस्तेमाल किया जाता है, जबकि कुछ विज्ञापन तो वज़न घटाने, दर्द और दूसरी बीमारियों में मदद करने का दावा भी करते हैं।
इन नतीजों पर प्रतिक्रिया देते हुए, एनएचएस इंग्लैंड की नेशनल मेडिकल डायरेक्टर प्रो. फ्रेंकी स्वॉर्ड्स ने कहा कि ऑनलाइन मेडिकल गलत जानकारी का बढ़ना चिंताजनक है। उन्होंने कहा, “कई डॉक्टर ऐसे मरीज़ों की बढ़ती संख्या के बारे में बता रहे हैं जो सिर्फ़ क्लिक पाने के लिए दी गई गलत सलाह की वजह से परेशान और उलझन में हैं।”
चिंता की बात यह है कि ये विज्ञापन खास तौर पर बड़ी उम्र की महिलाओं जैसे कंज्यूमर्स को टारगेट करते हैं। एक्सपर्ट्स के लिए असली डर यह है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब सिर्फ फेक न्यूज़ ही नहीं, बल्कि फेक मेडिकल एक्सपर्ट्स भी बना रहा है।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि सोशल मीडिया पर सफेद कोट और कॉन्फिडेंट टोन से प्रभावित होने के बजाय, हेल्थ से जुड़े हर दावे को असली मेडिकल सोर्स से वेरिफाई करें।