दुनिया भर में 1800 के दशक में लोगों ने यूकेलिप्टस के पेड़ लगाए मगर बहुत कम लोगों ने सोचा था कि आगे चलकर इनसे पर्यावरण से जुड़ी समस्याएं होंगी। इस धरती के लगभग हर महाद्वीप में पाया जाने वाले यूकेलिप्टस के बारे में सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि इसकी उत्पत्ति ऑस्ट्रेलिया की है।
इसके बावजूद इसे भारत में किसी भी किसी भी इलाक़े में देखा जा सकता है। यही नहीं इथियोपिया हो या कैलिफ़ोर्निया, कहीं भी इस लम्बे और चांदी जैसे पत्तों वाले पेड़ को देख सकते हैं। उतरती छाल वाले इस पेड़ में पुदीने जैसी खास खुशबू होती है। यह पेड़ अपनी खुशबूदार एसेंशियल ऑयल के लिए मशहूर है।
किसी ज़माने में यूकेलिप्टस के पेड़ को चमत्कारिक माना जाता था। ऑस्ट्रेलिया में मूल रीप से उगे यूकेलिप्टस के यह पेड़ 1800 के दशक में दुनिया भर में फैलने लगे। इन्हें औपनिवेशिक सरकारों, वन अधिकारियों और ज़मींदारों ने लगाया था, जो इन्हें कई समस्याओं का एक साथ समाधान मानते थे।
यूकेलिप्टस की दुनिया भर में करीब 800 से अधिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें से लगभग सभी ऑस्ट्रेलिया में हैं। यह एक ऐसा महाद्वीप है जहाँ की मिट्टी पुरानी होने के साथ खराब है और यहाँ अक्सर आग और सूखा की समस्या सामने आती है।
‘इंटरनेशनल रिव्यू ऑफ़ सोशल हिस्ट्री’ में छपे एक पेपर के अनुसार, यूकेलिप्टस को कभी एक चमत्कारिक पौधे जैसा माना जाता था; एक सदी से भी ज़्यादा समय तक, लोगों का मानना था कि ये पेड़ ट्रॉपिकल बीमारियों को ठीक करने में मदद कर सकते हैं और साथ ही लगातार मुनाफ़ा भी दे सकते हैं।
इसके बाद, इन्हें ऑस्ट्रेलिया, एशिया, अफ्रीका, यूरोप और अमरीका में बहुत अलग-अलग तरह की जलवायु वाली जगहों पर लगाया गया। उस समय वन अधिकारी इस बात से प्रभावित थे कि ये पेड़ तेज़ी से बढ़ते थे, इनकी लकड़ी बहुत मज़बूत होती थी, और ये उन जगहों पर भी आसानी से जड़ जमा लेते थे जहाँ दूसरे पेड़ों को उगने में मुश्किल होती थी।
जहाँ एक तरफ यूकेलिप्टस (सफ़ेदा) का पेड़ अपनी तेज़ वृद्धि और व्यावसायिक लाभ के कारण लोकप्रिय है, वहीँ पर्यावरण और कृषि के लिए इसके कई गंभीर नुकसान भी सामने एते हैं। यह मिट्टी की नमी और भूजल स्तर को तेजी से खींचता है, आसपास अन्य वनस्पतियों को नहीं उगने देता, और इसमें मौजूद तेल के कारण जंगलों में आग का खतरा बढ़ता है।
पर्यावरण और मिट्टी पर प्रभावजल स्तर में कमी का कारण बनता है। दरअसल यह पेड़ यह पेड़ भारी मात्रा में पानी अवशोषित करता है, जिससे आसपास के क्षेत्रों का भूगर्भ जलस्तर गिर सकता है।
यह जैव विविधता को उस समय भारी नुकसान पहुंचता है जब इसकी पत्तियों से निकलने वाले रसायनों (एलेलोपैथी) के कारण दूसरी घास या पेड़-पौधे नहीं पनप पाते।
मिट्टी को बंजर बनाने में भी इस पौधे का हाथ है। यह मिट्टी के पोषक तत्वों का अत्यधिक दोहन करता है, जिससे ज़मीन की उपजाऊ क्षमता घट जाती है।
क्यूंकि स्थानीय पक्षी और जीव इन पेड़ों पर घोंसला बनाना या रहना पसंद नहीं करते। इसलिए इससे वन्यजीवन को वह सहयोग नहीं मिलता जो अन्य पेड़ों से मिलता है।
यह पेड़ आग का खतरा भी पैदा करता है। इसकी पत्तियों और छाल में ज्वलनशील तेल होता है, जिससे गर्मियों में आग तेजी से फैलती है।
इन सबके बावजूद, यूकेलिप्टस के पेड़ों में खासियत है कि यह हर परिस्थिति में जीवित रहने में सक्षम हैं। पौधे के बड़े होने पर इसकी जड़ें जमीन में बहुत नीचे तक जाकर नमी ढूंढ लेती हैं। इनकी सख्त पत्तियां तेज धूप और कम पानी में भी सूखने से बची रहती हैं। कहते हैं कि इन्हें नष्ट करना कठिन है।