अगर आप चाहते हैं कि आपकी उम्र बढ़ने के साथ आपका दिमाग एक्टिव, तेज़ और सेहतमंद रहे, तो नई भाषा सीखने की आदत इस लक्ष्य को पाने में अहम भूमिका निभा सकती है। एक नई रिसर्च कुछ ऐसे ही संकेत देती है।
स्पेन में हुई एक नई मेडिकल स्टडी से पता चला है कि जो लोग एक से ज़्यादा भाषाएँ अच्छी तरह जानते हैं, उनका दिमाग उम्र बढ़ने के बावजूद काफ़ी जवान रहता है और उनमें दिमाग के बूढ़े होने की रफ़्तार भी धीमी हो सकती है।
बार्सिलोना में आयोजित फेडरेशन ऑफ यूरोपियन न्यूरोसाइंस सोसाइटीज सम्मेलन में पेश की गई एक रिसर्च के अनुसार, नई भाषा सीखना सिर्फ़ बातचीत का ज़रिया पाने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इस प्रोसेस के दौरान, दिमाग लगातार नई जानकारी स्टोर करता है, अलग-अलग हिस्सों के बीच कनेक्शन मज़बूत करता है और दिमागी क्षमताओं को एक्टिव रखता है, जिसका बदले में दिमाग के काम करने के तरीके पर अच्छा असर पड़ता है।
यह स्टडी स्पेन में बास्क सेंटर ऑन कॉग्निशन, ब्रेन एंड लैंग्वेज के एक्सपर्ट्स ने की थी, जिसमें शुरुआती दौर में 728 लोग शामिल थे। हिस्सा लेने वालों के ब्रेन स्कैन के डिटेल्ड रिव्यू के बाद, रिसर्चर्स ने एक ऐसा सिस्टम बनाया जिसे दिमाग की उम्र जांचने वाली घड़ी बताया गया। इस तरीके से, दिमाग के अलग-अलग हिस्सों के आपसी कनेक्शन और एक्टिविटी के आधार पर हर व्यक्ति की असली दिमागी उम्र का अंदाज़ा लगाया गया।
रिसर्च के नतीजों को और बेहतर बनाने के लिए, बाद में इसमें 144 और लोगों को शामिल किया गया और उन्हीं सिद्धांतों के हिसाब से उनके दिमाग का एनालिसिस किया गया। दोनों स्टेज के नतीजों ने एक ही ट्रेंड को कन्फर्म किया कि जो लोग कई भाषाएँ जानते हैं उनका दिमाग सिर्फ़ एक भाषा बोलने वालों की तुलना में काफ़ी जवान दिखता है।
रिसर्चर्स के मुताबिक, नतीजों से पता चला कि जो लोग एक से ज़्यादा भाषाएँ बोलते हैं उनका दिमाग औसतन 6 से 13 साल जवान दिखता है। स्टडी में यह भी ट्रेंड सामने आया कि भाषाओं की संख्या बढ़ने के साथ, दिमाग की उम्र में और कमी देखी गई।
डेटा के मुताबिक, जो लोग 2 भाषाएँ अच्छी तरह जानते हैं उनका दिमाग लगभग 6 साल जवान दिखा, जो लोग 3 भाषाएँ जानते हैं उनमें यह अंतर लगभग 7 साल तक पहुँच गया, जबकि जो लोग 4 भाषाएँ जानते हैं उनके दिमाग के एनालिसिस में उम्र का अंतर 13 साल तक रिकॉर्ड किया गया। एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस स्टडी से पता चलता है कि अलग-अलग भाषाएँ सीखने और इस्तेमाल करने से दिमाग लगातार एक्टिव रहता है, जिससे उसकी परफॉर्मेंस बेहतर होने के चांस बढ़ जाते हैं। उनके मुताबिक, नई भाषा सीखने की आदत, खासकर टीनएज में, भविष्य में दिमाग की उम्र बढ़ने की रफ़्तार को धीमा करने में मददगार हो सकती है।
रिसर्चर्स ने आगे कहा कि अगले फेज़ में, वे इस बात की भी डिटेल में जांच करेंगे कि कई भाषाएँ सीखने से अल्ज़ाइमर और दिमाग को नुकसान पहुँचाने वाली दूसरी बीमारियों के रिस्क या स्पीड पर कितना पॉजिटिव असर पड़ता है।