आज जब देश में प्रति 1,000 व्यक्तियों पर अस्पताल में भर्ती होने की दर 29 पर स्थिर है वहीँ ग्रामीण क्षेत्रों में यह दर 26 से बढ़कर 29 हुई है, जबकि शहरों में यह 34 से घटकर 32 पर आ गई है।
हेल्थ इंश्योरेंस लेने के बाद काफी लोगों को लगता है कि इलाज का पूरा खर्च बीमा से पूरा हो जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक इलाज का 95 फीसदी तक का खर्च मरीज खुद उठा रहा है।
इस समय देश में हेल्थ इंश्योरेंस को लेकर लोगों में काफी जागरूकता देखी गई है। एक तरफ जहाँ वालों में हेल्थ इंश्योरेंस को लेकर रुझान बढ़ा है वहीं हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम से जुड़ी रिपोर्ट चौंकाने वाली है।
रिपोर्ट के मुताबिक़, हेल्थ इंश्योरेंस स्कीम होने के बाद भी मरीजों को इलाज के खर्च का बड़ा हिस्सा अपनी जेब से या उधार लेकर चुकाना पड़ता है। यह जानकारी राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के साल 2025 के नवीनतम सर्वे में सामने आई है।
एनएसओ की ओर से जारी इस रिपोर्ट में जनवरी से दिसंबर 2025 के बीच घरेलू उपभोग सर्वेक्षण (Household Consumption Survey) किया गया। सर्वे से पता चला कि अस्पताल में भर्ती होने के दौरान इलाज के खर्च का एक बड़ा हिस्सा आज भी परिवारों को अपनी बचत, कर्ज या संपत्ति बेचकर चुकाना पड़ रहा है।
वहीँ सर्वे से यह जानकारी भी सामने आई कि साल 2017-18 की तुलना में स्वास्थ्य योजनाओं के कवरेज में भारी वृद्धि हुई है, जबकि ओओपीई यानी आउट-ऑफ-पॉकेट एक्सपेंडेचर या अपनी जेब से खर्च के मामले में कोई खास सुधार नहीं दिखा।
ग्रामीण भारत भारत की बात करें तो सरकारी और अन्य स्वास्थ्य योजनाओं का कवरेज 13 प्रतिशत से बढ़कर 46 प्रतिशत हो गया है। रिपोर्ट बताती है कि अस्पताल में भर्ती होने पर खर्च होने वाले औसतन 33,000 रुपये के खर्च का 95% हिस्सा यानी करीब 31,500 रुपये मरीजों को खुद वहन करने पड़ रहे हैं।
वहीँ शहरी भारत से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि यह कवरेज 9 प्रतिशत से बढ़कर 32 हो गया है। शहर में अस्पताल का औसत खर्च 47,000 रुपये है, जिसमें से 83 प्रतिशत यानी करीब 39,000 रुपये मरीज अपनी जेब से दे रहे हैं।
रिपोर्ट से इलाज की लागत में भारी उछाल की बात भीं सामने आई है। पिछले 7-8 वर्षों में अस्पताल में भर्ती होने का खर्च लगभग दोगुना हो गया है। इसके अलावा ग्रामीण इलाकों में इलाज की लागत में 97 फीसद की भारी बढ़ोतरी देखी गई है। वहीँ शहरी इलाकों में यह खर्च 77 फीसद तक बढ़ा है।
रिपोर्ट से पता चला है कि बच्चे के जन्म के समय होने वाला मेडिकल खर्च और जेब से होने वाला खर्च भी लगभग बराबर है। हालांकि, शहरी भारत में स्वास्थ्य योजनाओं का लाभ ग्रामीण क्षेत्रों के मुकाबले थोड़ा बेहतर तरीके से मिल रहा है।