मार्च 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, लखनऊ दुनिया के शीर्ष 100 सबसे प्रदूषित शहरों में 58वें स्थान पर है। यूपी के कई शहर वायु प्रदूषण के मामले में बच्चों के स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बने हुए हैं। गाजियाबाद, नोएडा और मेरठ जैसे शहर भी 420 के बेहद खराब एक्यूआई के पार रहने के साथ इस सूची में शामिल हैं।
लखनऊ दुनिया का 58वां सबसे प्रदूषित शहर बन गया है। स्विस संस्था आईक्यूएयर द्वारा जारी 2025 के आंकड़े दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों की जानकारी देते हैं। इसे सेहत की दृष्टि से भी बेहद खतरनाक बताया गया है।
स्विट्ज़रलैंड की संस्था आईक्यूएयर द्वारा जारी 2025 के आंकड़ों से पता चलता है कि इस सूची में भारत के 64 शहर शामिल हैं। इनमें भी उत्तर प्रदेश के 11 शहर आते हैं। दुनिया के सबसे प्रदूषित शहर के रूप में गाजियाबाद का लोनी का मान दर्ज है। वहीँ इस रिपोर्ट के हवाले से स्वास्थ्य विभाग ने बच्चों और बुजुर्गों का खास ध्यान रखने की नसीहत दी है।
लखनऊ की बात करें तो 9446 शहरों के सर्वेक्षण में, लखनऊ 58वां सबसे प्रदूषित शहर है और यह बच्चों के स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा है विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक की तुलना में यहाँ दस गुना ज्यादा पीएम 2.5 प्रदूषण कणों का औसत 54.2 µg/m³ दर्ज किया गया है। इस शहर में वायु प्रदूषण के अलावा सड़कों पर गड्ढे, उड़ती धूल, वाहनों से निकलता धुआं और निर्माण और टूटे घरों के मलबा के चलते यह समस्या बढ़ने की बात कही गई है।
रिपोर्ट में सेहत से जुड़ी चेतावनी है कि प्रदूषित वायु से होने वाला असर जीवनभर रहता है। जीवन के शुरुआती साल में फेफड़ों को होने वाला नुकसान पूरी जिंदगी बुरा असर डालती है। आईक्यूएयर रिपोर्ट में 143 देशों और क्षेत्रों के 9,446 शहरों का डेटा शामिल है। इसे 40 हज़ार से ज्यादा मॉनिटरिंग स्टेशनों और सेंसरों से लिया गया है।
याद दिला दें कि आईक्यूएयर की साल 2024 की रिपोर्ट में भारत दुनिया का 5वां सबसे प्रदूषित देश था। देश में प्रदूषण का डब्ल्यूएचओ की सेफ कैटेगरी से दस गुना ज्यादा यानी स्तर 50.6 µg/m³ था। असम का बर्नीहाट देश का सबसे प्रदूषित शहर था जबकि दिल्ली दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी भी 2024 में थी। इतना ही नहीं पिछली रिपोर्ट के मुताबिक़, दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में से 13 भारत से थे।
गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रदुषण को नॉन-कम्युनिकेबल बीमारियों जैसे हृदय रोग, स्ट्रोक, कैंसर आदि का बड़ा कारण बताया है। इसके लिए विश्व स्वास्थ्य सभा ने 2040 तक वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों को आधा करने का रोडमैप भी मंजूर किया है।वहीँ 2025 में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट में पहली बार एयर पॉल्यूटेंट्स को टॉप-टियर ग्लोबल रिस्क माना गया है।