भारत में बुज़ुर्ग वर्ग की आबादी यहाँ की कुल आबादी का यह एक बड़ा हिस्सा है। यह संख्या आने वाले वर्षों में यह और भी बढ़ेगी। ऐसे में बढ़ती बुजुर्ग आबादी के साथ कई चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं।

विचार किया जाए तो भारत बुजुर्गों की बढ़ती आबादी चिंतन का गंभीर सामाजिक और आर्थिक सच है। स्वास्थ्य मंत्रालय के एक अध्ययनसे पता चलता है कि साल 2050 तक भारत की आबादी में बुजुर्गों का हिस्सा बढ़कर 19.5% हो जाएगा। संख्या के एतबार से यह करीब 31.9 करोड़ होगा।
भारत में 60 साल और उससे ज्यादा आयु के करीब 15 करोड़ लोग हैं। बुज़ुर्गों की यह संख्या रूस की पूरी आबादी के बराबर है। अनुमान है कि साल 2036 तक यह आंकड़ा 23 करोड़ तक पहुंच जाएगा। वर्तमान आंकड़े बताते हैं कि आर्थिक रूप से भी लगभग 70% बुजुर्ग अपने रोजमर्रा के खर्चों के लिए परिवार के सदस्यों या अपनी मामूली पेंशन पर निर्भर हैं। यह संख्या उनकी आर्थिक असुरक्षा को दर्शाती है।
और अगर 45 वर्ष और उससे ज्यादा उम्र के लोगों को भी इसमें शामिल कर लें तो 2050 तक वे आबादी का लगभग 40% यानी करीब 65.5 करोड़ लोग होंगे। यह एक बहुत बड़ा जनसांख्यिकीय बदलाव है।
इन सबके बीच देश में ‘सिल्वर इकोनॉमी’ यानी बुजुर्गों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली सेवाओं का बाजार बहुत बढ़ा है। बीते वर्ष जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, यह बाजार पहले से ही 73,000 करोड़ रुपये का है जिसमे आने वाले वर्षों में कई गुना इज़ाफ़ा होने की उम्मीद है।
देश में तेज़ी से बढ़ रही इस बुजुर्ग आबादी के साथ कई चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं। इनमें सबसे बड़ी चिंता स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर है। आंकड़े बताते हैं कि भारत में पांच में से केवल एक बुजुर्ग के पास स्वास्थ्य बीमा है। इन परिस्थितियों में ज्यादातर बुजुर्ग अपनी स्वास्थ्य जरूरतों के लिए राशि का इंतजाम स्वयं करते हैं या फिर अन्य पर निर्भर रहते हैं।
देश में बुजुर्गों की आबादी का इस तेजी से बढ़ना उस समय एक बड़ी चुनौती बन जाता है जब स्वास्थ्य सेवाओं और आर्थिक निर्भरता के क्षेत्र में समान वृद्धि न हो। वहीँ दूसरी ओर इन हालत को ‘सिल्वर इकोनॉमी’ के लिए बड़े अवसर भी कहा जा रहा है। बुजुर्गों के लिए कई कंपनियां नए उत्पाद और सेवाएं ला रही हैं। इस नज़रिये से स्थिति को देश के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण कहा जा सकता है।
