प्रत्येक वर्ष 12 अगस्त को विश्व हाथी दिवस मनाया जाता है। आज दिन एशियाई और अफ्रीकी हाथियों की संरक्षण चुनौतियों के प्रति जागरूक और सजग करने का दिन है।

मानव-हाथी संघर्ष के अलावा अवैध शिकार और निवास स्थान के नुकसान के प्रति जागरूकता जैसे लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए 2012 में विश्व हाथी दिवस की शुरुआत की गई थी। आज का दिन एशियाई और अफ्रीकी हाथियों के संरक्षण पर जोर देता है। विश्व हाथी दिवस 2025 की थीम है- ” मातृसत्ता और स्मृतियाँ “, जो हाथी झुंड की महिला नेताओं और उनकी गहरी यादों का जश्न मनाता है।
भारत में भी मानव-हाथी संघर्ष की घटनाएं बढ़ रही हैं। इस देश में विश्व की सबसे बड़ी जंगली एशियाई हाथी आबादी निवास करती है। साल 2017 की गणना के अनुसार यहाँ हाथियों की संख्या 27,312 बताई गई है। हालाँकि इन विशाल प्राणियों के लिए एक महत्वपूर्ण संरक्षण केंद्र होने के बावजूद बढ़ती आबादी के चलते जंगलों का कटाव और कॉरिडोर का सिकुड़ना एक गंभीर खतरा है।
WWF द्वारा एकत्रित आँकड़ों के अनुसार, लगभग एक सदी पहले अफ्रीकी हाथियों की संख्या एक करोड़ से ज़्यादा थी। जबकि एशिया में छोटे एशियाई हाथियों की संख्या एक लाख से ज़्यादा थी। इस विषय पर काम करने वाली संस्था सावो ट्रस्ट (Tsavo Trust) द्वारा की गई गणना के अनुसार, आज 5,00,000 से भी कम हाथी बचे हैं – और ये संख्या अफ्रीकी और एशियाई दोनों प्रजातियों की है। अफ्रीका में लगभग 4,15,000 हाथी बचे हैं, जबकि एशिया में इनकी संख्या मात्र 40,000 है।
भारत में दुनिया के जंगली हाथियों की लगभग 60% आबादी पाई जाती है। ‘भारत में हाथी गलियारे’ रिपोर्ट के मुताबिक यहां 33 हाथी अभयारण्य और 150 चिन्हित हाथी गलियारे हैं। झारखंड का पलामू टाइगर रिजर्व इस प्रजाति को बचाने में एक बड़ा उदहारण पेश करता है। पलामू टाइगर रिजर्व पलामू, गढ़वा, और लातेहार जिलों में 1,129 वर्ग किमी में फैला है। यहाँ करीब 150 से 180 हाथी निवास करते हैं। पूरे झारखंड में इनकी संख्या लगभग 600 के करीब है। यह इलाक़ा वन्यजीव प्रेमियों और शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का केंद्र है। इस क्षेत्र में ये हाथी अपने निश्चित कॉरिडोर के माध्यम से मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ तक भी विचरण करते हैं।
पलामू टाइगर रिजर्व के संबंध में डीएनए टेस्ट के आधार पर विशेषज्ञों ने पुष्टि की है कि ये एक मिक्स ब्रीड हैं, जिसमें चार प्रजातियों की विशेषताएं हैं। बताते चलें कि भारत में चार प्रमुख प्रकार के एशियाई हाथी पाए जाते हैं। इनमें मयूरभंजी, तराई, असमिया, और दक्षिणी, प्रत्येक की अपनी शारीरिक विशेषताएं हैं।
ब्रिटिश शासनकाल के दौरान 1898 में सांडर्स की वन्यजीव रिपोर्ट और 1926 में गवर्नर मेल की रिपोर्ट में पलामू में हाथियों का कोई उल्लेख नहीं था। ऐसे में पलामू के जंगलों में हाथियों की मौजूदगी का इतिहास अपेक्षाकृत नया और रोचक है।
यहाँ पहली बार 1936 में बारेसांढ जो वर्तमान में पीटीआर और लातेहार का हिस्सा है, में चार हाथियों और उनके एक बच्चे को देखा गया। यह बैलगाड़ी में लदे अनाज को खा रहे थे। इस घटना को पलामू में हाथियों की मौजूदगी के पहले प्रमाण के रूप में दर्ज किया गया है।
हाल के वर्षों में भोजन और पानी की तलाश में हाथियों के मानव बस्तियों में घुसने की घटनाएं बढ़ी हैं। इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए हाथी संरक्षण के प्रति जनजागरूकता बढ़ाने के लिए एक राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम भी शुरू किया जाएगा। इस अभियान में देश के 5,000 स्कूलों को शामिल करते हुए करीब12 लाख स्कूली बच्चों को जोड़ा जाएगा।















