संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय (OHCHR) द्वारा जारी नए आँकड़ों के अनुसार, बीते वर्ष युद्ध व हिंसक टकराव में मारे गए आम लोगों की संख्या में 40 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।

मानवाधिकार कार्यालय के ये नए आँकड़ों बताते हैं कि पहले से ही हाशिए पर जीने के लिए मजबूर समुदायों को अत्यधिक भेदभाव का सामना करना पड़ा है। यूएन कार्यालय द्वारा जमा की गई इस जानकारी के मुताबिक़, साल 2024 में कम से कम 48 हज़ार 384 लोग मारे गए। रिपोर्ट के अनुसार, इनमें से अधिकाँश आम नागरिक थे।
साल 2023-24 के बीच, हिंसा में 2021–2022 की तुलना में लगभग चार गुना अधिक बच्चों और महिलाओं की हत्या हुई।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर टर्क़ इस संबंध में कहते हैं- “हर आँकड़े के पीछे एक कहानी है। हर डेटा बिन्दु के पीछे एक इनसान है।” आगे उनका कहना है कि शान्तिकाल और हिंसक टकराव की परिस्थितियों के दौरान, आमजन की मौतों में यह चिन्ताजनक वृद्धि, सबसे नाज़ुक हालात से जूझ रहे लोगों की रक्षा करने में गम्भीर विफलताओं को उजागर करती है।
रिपोर्ट से पता चलता है कि पिछले दो वर्षों में सशस्त्र टकरावों के दौरान बच्चों और महिलाओं ने विनाशकारी हिंसा का सामना किया। साल 2023 और 2024 के बीच, हिंसा में 2021–2022 की तुलना में लगभग चार गुना अधिक बच्चों और महिलाओं की हत्या हुई।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर टर्क़ का कहना है कि यह एक ऐसे वैश्विक मानवाधिकार परिदृश्य को दर्शाती है, जहाँ तत्काल कार्रवाई की ज़रूरत है।
साल 2024 में मारे गए लोगों में से 500 से अधिक मानवाधिकार रक्षक थे, और पत्रकारों को जान से मार दिए जाने की घटनाओं में भी 2023 की तुलना में 10 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
मानवाधिकार रक्षकों और पत्रकारों को निशाना बनाए जाने का स्तर चिन्ताजनक रूप से अधिक है, जहाँ हर 14 दिन में कम से कम एक मानवाधिकार कार्यकर्ता, पत्रकार या मज़दूर संघ नेता की हत्या की गई या उसे जबरन ग़ायब कर दिया गया।
पश्चिमी एशिया सहित उत्तरी अफ़्रीका में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार करने मामले सबसे अधिक संख्या में सामने आए, जबकि हत्याओं के मामले लैटिन अमरीका और कैरेबियाई क्षेत्रों में गम्भीर स्थिति है।













