वन अधिनियम पर क्या कहना है सुप्रीम कोर्ट का

उच्चतम न्यायालय ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया था कि वे एक महीने के भीतर विशेषज्ञ समिति का गठन करें। इसमें वन जैसे क्षेत्रों, अवर्गीकृत और सामुदायिक वन भूमि सहित विभिन्न भूमि का समेकित रिकॉर्ड तैयार करने की बात कही गई थी।

वन अधिनियम पर क्या कहना है सुप्रीम कोर्ट का

न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और न्यायमूर्ति बी आर गवई की पीठ का कहना था विशेषज्ञ समिति वन (संरक्षण एवं संवर्धन) नियम, 2023 के नियम 16 ​​(1) के तहत आवश्यक कार्य छह महीने के भीतर पूरा करेगी।

बृहस्पतिवार को कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए उस आदेश की सराहना की जिसमें देश में पारिस्थितिक संरक्षण के लिए संस्थानों के साथ-साथ नियामक प्रणालियों को कमजोर करने के मोदी सरकार के व्यवस्थित प्रयासों पर कड़ी फटकार दी गई है।

वन अधिनियम पर क्या कहना है सुप्रीम कोर्ट का

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर साझा एक पोस्ट में लिखा- ‘‘वन (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2023 केंद्र सरकार द्वारा पेश किए गए सबसे कठोर कानूनों में से एक था। जब से इसे संसद के माध्यम से पेश किया गया और इसे मनमाने ढंग से पारित कराया गया।’’

मंगलवार को शीर्ष अदालत ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया था कि वे एक महीने के भीतर वन जैसे क्षेत्रों, अवर्गीकृत और सामुदायिक वन भूमि सहित विभिन्न भूमि का समेकित रिकॉर्ड तैयार करने के लिए विशेषज्ञ समिति का गठन करें।

जयराम रमेश ने इसे एक स्वागत योग्य घटनाक्रम बताते हुए कहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी है कि अगर वे एक महीने के भीतर इन समितियों का गठन करने और अगले छह महीनों के भीतर इन जमीनों का एक समेकित रिकॉर्ड तैयार करने में विफल रहते हैं तो यह राज्यों के मुख्य सचिवों को व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी ठहराएगा।

बताते चलें कि भारतीय वन अधिनियम, 1927, वनों के प्रबंधन से जुड़ा एक कानून है। यह अधिनियम, वनों के संरक्षण, वन अपराधों से निवारण, वनों से जुड़े कानूनों को एक जगह लाने और वनों से जुड़े शुल्कों को तय करने के लिए बनाया गया था।

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