हर साल पहली मार्च को शून्य भेदभाव दिवस (Zero Discrimination Day) मनाया जाता है। कितनी अजीब बात है कि इस दिन के एक दिन पहले अमरीका और इज़राइल मिल कर ईरान पर हमला कर देते हैं।

हालांकि इस दिन की शुरुआत असल में यूएन एड्स ने भेदभाव से लड़ने के लिए की थी। खासकर एचआईवी से पीड़ित लोगों के खिलाफ इसे मानाने की बुनियाद पड़ी। एक ग्लोबल इवेंट के रूप में इस दिन को मानाने के का मक़सद हेल्थ, वेल-बीइंग और जीवन के तमात स्टारों पर असर डालने वाले सभी तरह के भेदभाव को दूर करने को बढ़ावा देना है। इस साल इस इंटरनेशनल डे की बारहवीं वर्षगांठ है।
आज यानी एक मार्च 2026 को मनाए जाने वाले जीरो डिस्क्रिमिनेशन डे की थीम “जनता सर्वोपरि” (People First) है। यह थीम स्वास्थ्य और जीवन परिणामों को बेहतर बनाने के लिए भेदभावपूर्ण और दंडात्मक कानूनों को हटानेतथा एचआईवी के साथ जी रहे लोगों के अधिकारों की रक्षा करने पर जोर देती है।
ज़ीरो डिस्क्रिमिनेशन डे का मक़सद
भेदभाव को समझना: भेदभाव में नस्ल, जेंडर, उम्र या सेक्सुअल ओरिएंटेशन जैसी खासियतों के आधार पर गलत या अन्यायपूर्ण बर्ताव शामिल है। एचआईवी से पीड़ित लोगों को अक्सर परिवारों, समुदायों और यहां तक कि हेल्थ-केयर सेटिंग्स में भी बदनामी और भेदभाव का सामना करना पड़ता है।
दिसंबर 2013 में यूएन एड्स (UNAIDS) के ज़ीरो डिस्क्रिमिनेशन कैंपेन के लॉन्च के बाद, यूनाइटेड नेशंस ने पहली बार पहली मार्च 2014 को ज़ीरो डिस्क्रिमिनेशन डे मनाया। इस दिन का सिंबल एक तितली है, जो भेदभाव को खत्म करने के लिए मिलकर किए गए प्रयासों और पॉजिटिव बदलाव को दिखाता है।
आम जनता पर भेदभाव का असर
काम की जगह पर भेदभाव का मेंटल हेल्थ पर बुरा असर पड़ सकता है, जिससे स्किल्स और काबिलियत में कमी आ सकती है। ऑर्गनाइज़ेशन के अंदर यह भेदभाव किसी के लिए भी परेशानी और अकेलापन पैदा कर सकता है। भेदभाव के उलट, सबको शामिल करना ऑर्गनाइज़ेशन की सफलता के लिए ज़रूरी है और क्रिएटिविटी, इनोवेशन को बढ़ावा देता है।
युवाओं में भेदभाव और मेंटल हेल्थ समस्या:
स्टडीज़ से पता चलता है कि भेदभाव से युवा वयस्कों में मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम का खतरा बढ़ जाता है। जिन लोगों के साथ भेदभाव होता है, उनमें मेंटल डिसऑर्डर होने और गंभीर साइकोलॉजिकल परेशानी होने की संभावना ज़्यादा होती है।
