ब्रिटिश विश्वविद्यालय के भौतिकविदों ने एक ऐसा उपकरण बनाया है जिसे उन्होंने “दुनिया का सबसे छोटा वायलिन” कहा है। नैनो तकनीक का उपयोग करके बनाए गए इस वायलिन को माइक्रोस्कोप के बिना नहीं देखा जा सकता है।

लॉफबोरो विश्वविद्यालय की टीम का कहना है कि यह प्लैटिनम वायलिन 35 माइक्रोन लंबा और 13 माइक्रोन चौड़ा है। एक माइक्रोन एक मीटर का दस लाखवाँ हिस्सा होता है। इस वायलिन की माप बताते है कि यह वायलिन इंसान के बाल से भी बारीक है। बताते चलें कि एक बाल की मोटाई आमतौर पर 17 से 180 माइक्रोन के बीच होती है।
हालाँकि हम इस वायलिन से निकट भविष्य में कोई छोटी धुन नहीं सुन सकते हैं, लेकिन इसका अस्तित्व नैनोस्केल इंजीनियरिंग की दुनिया और भविष्य के लिए इसके संभावित अनुप्रयोगों में एक महत्वपूर्ण कदम है।
शोधकर्ताओं ने अपनी नई नैनोलिथोग्राफी तकनीक की क्षमताओं को प्रदर्शित करने के लिए इस बहुत ही बारीक संगीत वाद्ययंत्र का निर्माण किया। यह एक ऐसी तकनीक है जो वैज्ञानिकों को नैनो-आकार की वस्तुएँ और संरचनाएँ बनाने की अनुमति देती है।
लॉफ़बोरो विश्वविद्यालय के भौतिकी विभाग के प्रमुख प्रोफेसर केली मॉरिसन ने एक समाचार विज्ञप्ति में कहा, “हालाँकि दुनिया का सबसे छोटा वायलिन बनाना मज़ेदार और खेल जैसा लग सकता है, लेकिन इस प्रक्रिया में हमने जो कुछ भी सीखा है, उसने वास्तव में उस शोध के लिए आधार तैयार किया है जिसे हम अभी कर रहे हैं।”
लॉफ़बोरो यूनिवर्सिटी की टीम स्वीकार करती है कि उनका छोटा वायलिन कोई धुन बनाने में सक्षम नहीं है, लेकिन इसका निर्माण एक महत्वपूर्ण उद्देश्य पूरा करता है।
यह परियोजना विश्वविद्यालय की नई नैनोलिथोग्राफी प्रणाली के लिए एक परीक्षण स्थल के रूप में कार्य करती है, जिससे रिसर्चर को नैनोस्केल पर संरचनाओं के निर्माण और विश्लेषण में इसकी क्षमताओं का पता लगाने का अवसर मिलता है। इस तरह के प्रयोग कंप्यूटिंग और एनर्जी हार्वेस्टिंग के लिए नए तरीकों के साथ संभावित नई तकनीकों और विकास के रास्ते खोलते हैं।















