राकेश शर्मा को अंतरिक्ष में गए चार दशक से अधिक का समय हो गया है मगर उससे भी सात साल पहले हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायिका सुरश्री केसरबाई केरकर की आवाज़ अंतरिक्ष में अपनी पहुँच दर्ज करा चुकी है।
बात है साल 1977 की। इस समय वॉयजर गोल्डन रिकॉर्ड के लिए महान हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायिका सुरश्री केसरबाई केरकर की आवाज़ को चुना था। उनका प्रसिद्ध राग भैरवी गीत ‘जात कहां हो’ अंतरिक्ष में भेजा गया था।
आज से करीब पांच दशक पहले भारतीय गायिका की आवाज अंतरिक्ष में गूंजी थी। केसरबाई केरकर की जादुई आवाज को इस बात के लिए भी याद किया जा सकता है कि उनकी गायकी अंतरिक्ष तक जा पहुंची थी।
केसरबाई केलकर का जन्म उस समय हुआ था जब गोवा में पुर्तगालियों का शासन हुआ करता था। यह 13 जुलाई 1892 की तारीख थी। देवदासी परंपरा में जन्मी केसरबाई केलकर में बचपन से ही संगीत को लेकर एक खास लगाव था। यही खास उस समय सामने आया जब उन्होंने परंपराओं को तोड़ते हुए सुरों के साथ अपनी दोस्ती की व अपनी आवाज को आसमान तक पहुंचा दिया।
संगीत के प्रति समर्पित केसरबाई ने सिर्फ 16 साल की उम्र में ही शास्त्रीय संगीत सीखना शुरू कर दिया था और इसके लिए वे मुंबई चली आई थीं। हालाँकि इस शिक्षा के दौरान उन्होंने कई गुरुओं से शिक्षा ली थी, लेकिन उनको जिस सुर की तलाश थी वह अभी भी उन से दूर था।
क्यूंकि केसरबाई केलकर चाहती थीं कि वे उस्ताद अल्लादिया खान से शिक्षा लें और वह उन तक पहुँच भी गईं। उस्ताद ने केसरबाई को तीन महीने परखने के बाद मना कर दियामगर वह निराश नहीं हुईं। इस बार वह शाहू महाराज से मदद लेने पहुंचीं और यहीं से उनकी जिंदगी का वह रास्ता खुला जो उन्हें आसमानों तक ले गया।
इस सुर साधना में उन्होंने 25 बरस लगा दिए। कहा जाता है कि वे गाती नहीं थीं, बल्कि संगीत में ही सांस लेती थीं। उनका मानना था कि संगीत को केवल महसूस नहीं किया जा सकता है, बल्कि बेचा नहीं जा सकता। और यही कारण था की उनके गायन की रिकॉर्डिंग नहीं हुई थी।
इसके बावजूद उनकी आवाज़ में गया राग भैरवी का गीत ‘जात कहां हो’ एक विरासत बन गया। दरअसल 1977 में नासा का भेजा Voyager 1 यान सौरमंडल से भी आगे जा रहा था। इसके साथ 27 देशों की सबसे सुंदर आवाजें दर्ज थीं। इन्हीं में एथ्नोम्यूजिकॉलजिस्ट रॉबर्ट ई. ब्राउन द्वारा ‘जात कहां हो’ भी था।
एथ्नोम्यूजिकॉलजिस्ट रॉबर्ट ई. ब्राउन का कहना था कि यह हिंदुस्तान के संगीत की सबसे सुंदर रिकॉर्डिंग में से एक है। उनकी इस सुरसाधना और सुंदर गायन पर 1938 में रवींद्रनाथ टैगोर ने उनको ‘सुरश्री’ की उपाधि दी थी। इसके अलावा उनको पद्म भूषण से भी सम्मानित किया गया था। इसी वर्ष यानी 1977 में ही केसरबाई का निधन हो गया था मगर आज भी अपनी अमर आवाज़ की की बदौलत वह अंतरिक्ष हैं।