सुप्रीम कोर्ट ने 13 महिला सैन्य अधिकारियों की उस याचिका पर बुधवार को सुनवाई की और यह सवाल उठाया कि एक ही प्रशिक्षण और नियुक्ति प्राप्त करने वाले पुरुष और महिला अधिकारियों के लिए दो मानदंड कैसे हो सकते हैं?

इस सुनवाई के दौरान बेंच के सवाल थे-
‘लिंग के आधार पर दो मानदंड कैसे हो सकते हैं?
क्या एसएससी महिला अधिकारियों और पुरुष अधिकारियों के मूल्यांकन का कोई अलग प्रारूप है?
क्या यह प्रारूप एसएससी अधिकारियों और स्थायी कमीशन वालों के लिए अलग है?’
गौरतलब है कि कोर्ट ने यह सवाल उस याचिका पर सुनवाई करते हुए पूछा, जिसमें 13 महिला सैन्य अधिकारियों को स्थायी कमीशन न दिए जाने को चुनौती दी गई है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने स्थायी कमीशन चाहने वाली शॉर्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) महिला सैन्य अधिकारियों के लिए ‘मानदंड नियुक्ति’ पर विचार में पुरुष समकक्षों की तुलना में ‘मनमानी’ पर असंतोष व्यक्त किया।
बताते चलें कि ‘मानदंड नियुक्ति’ का अर्थ आमतौर पर किसी कठिन और प्रतिकूल क्षेत्र या ऑपरेशन में किसी पद की कमान संभालने वाले अधिकारी से होता है। वरिष्ठ वकील का कहना था कि जिन 13 अधिकारियों का उन्होंने प्रतिनिधित्व किया उनमें लेफ्टिनेंट कर्नल वनिता पाधी कांगो में संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन में तैनात थीं, लेफ्टिनेंट कर्नल चांदनी मिश्रा 88 देशों में मैनोवरेबल एक्सपेंडेबल एरियल टारगेट (एमईएटी) उड़ाने वाली पहली महिला पायलट थीं। इसके अलावा लेफ्टिनेंट कर्नल गीता शर्मा ने लद्दाख जैसे उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तैनाती दी जबकि मेजर खिम ने अखनूर (पाकिस्तान सीमा के पास) में अपनी ड्यूटी की है।
अधिवक्ता अमृता पांडा और वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने 13 अधिकारियों की ओर से अपने तर्क में कहा कि उनके मुवक्किल अपने पुरुष समकक्षों के समान ट्रेनिंग और पोस्टिंग लेने के बावजूद प्राप्त आकस्मिक ग्रेडिंग से नाराज़ हैं।
अपनी दलील में वरिष्ठ वकील ने कहा कि यह ग्रेडिंग उस समय किए गए व्यक्तिपरक मूल्यांकन का नतीजा है जब वे स्थायी कमीशन (पीसी) के लिए पात्र नहीं थे। इस पर गुरुस्वामी का कहना था कि पुरुष अधिकारियों के विपरीत, जिनके प्रदर्शन का मूल्यांकन लगातार पीसी को ध्यान में रखकर किया जाता था, अपीलकर्ताओं की एसीआर 2019 में ही रोक दी गई थी, जबकि इस अदालत ने 2020 में महिलाओं को पीसी के लिए पात्रता प्रदान करने का फैसला सुनाया था।
अपने तर्क में वरिष्ठ वकील ने कहा कि उनके पुरुष समकक्षों के विपरीत, महिला अधिकारियों की एसीआर में इसे ‘मानदंड नियुक्ति’ के रूप में नहीं दर्शाया गया है। पीठ ने सवाल किया कि क्या इसका मतलब यह है कि महिला अधिकारियों के लिए यह मायने नहीं रखता कि वे कहां तैनात हैं, लेकिन पुरुष अधिकारियों के लिए स्थायी कमीशन देने के लिए दुर्गम क्षेत्रों में तैनाती पर विचार किया जाता है।
बताते चलें कि बेंच सेना में सेवारत और सेवा से मुक्त हुए अधिकारियों की याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि इसके बाद वह नौसेना और वायु सेना के उन अधिकारियों की याचिकाओं पर सुनवाई करेगी जो स्थायी कमीशन न दिए जाने से व्यथित हैं।
इस समस्या के लिए न्यायमूर्ति कांत ने कुछ वरिष्ठ अधिकारियों की रूढ़िवादी सोच और धारणाओं ज़िम्मेदार बताया और कहा कि सर्वोच्च न्यायालय गुरुवार को भी इन दलीलों पर सुनवाई जारी रखेगा।













