चावल दुनिया की आधी से ज़्यादा आबादी का पेट भरता है। लेकिन कई रिसर्च में एक ऐसा सवाल उठाया जा रहा है जो हममें से ज़्यादातर लोगों ने कभी नहीं सोचा कि क्या चावल उगाने का हमारा तरीका चुपचाप धरती को नुकसान पहुँचा रहा है?
वैज्ञानिकों का कहना है कि खेती का मौजूदा तरीका जलवायु, पानी और पोषक तत्वों के मामले में धरती की सुरक्षित सीमाओं को पार कर रहा है। इस वजह से चावल की हर प्लेट धरती के संतुलन को बनाए रखने की एक बड़ी प्रक्रिया का हिस्सा बन जाती है।
महमूद, गनी और घीवाला ने 2023 में ‘सस्टेनेबल प्रोडक्शन एंड कंजम्पशन’ में छपी अपनी स्टडी ‘पाकिस्तान में चावल की खेती की पर्यावरणीय स्थिरता का आकलन: प्लैनेटरी बाउंड्री-बेस्ड अप्रोच’ में इसी सवाल पर काम किया। उन्होंने ‘प्लैनेटरी बाउंड्री-बेस्ड लाइफ साइकिल असेसमेंट’ (PB-LCA) नाम की तकनीक का इस्तेमाल किया। यह तरीका कुछ ऐसा करता है जो पारंपरिक पर्यावरणीय स्टडीज़ में नहीं मापा जाता।
महमूद और उनकी टीम ने पाया कि चावल का उत्पादन कई अहम श्रेणियों—जैसे जलवायु परिवर्तन, मीठे पानी में पोषक तत्वों की अधिकता (यूट्रोफिकेशन) और पानी का इस्तेमाल—में सुरक्षित सीमा से ज़्यादा हो रहा है। इस तरह यह वैज्ञानिकों द्वारा बताए गए ‘ट्रिपल प्लैनेटरी क्राइसिस’ (तीन तरह के पर्यावरणीय संकट) में योगदान दे रहा है।
‘प्लैनेटरी बाउंड्रीज़’ (धरती की सीमाएँ) क्या हैं?
कल्पना कीजिए कि धरती पर कई जुड़े हुए सिस्टम हैं, जैसे जलवायु, जल चक्र और पोषक तत्वों का प्रवाह, जिनकी एक प्राकृतिक सीमा होती है। अगर आप इन सीमाओं को बहुत ज़्यादा पार करते हैं, तो धरती ऐसी स्थितियों में पहुँच सकती है जिन्हें बदलना बहुत मुश्किल हो जाता है।
अगर आप देखें कि धान असल में कैसे उगाया जाता है, तो समस्याएं समझना मुश्किल नहीं है। खेतों में पानी भरा जाता है, पौधे लगाए जाते हैं, खाद डाली जाती है, पूरी फसल के दौरान पानी का स्तर मैनेज किया जाता है, और फिर फसल की कटाई, सुखाने, ट्रांसपोर्ट और मिलिंग की जाती है। हर चरण में ऊर्जा और संसाधनों की ज़रूरत होती है और पर्यावरण पर असर पड़ता है।
पानी एक बड़ी समस्या है। धान बड़े पैमाने पर उगाई जाने वाली सबसे ज़्यादा पानी की खपत वाली फसलों में से एक है, और सिंचाई के लिए भूजल का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है, जो एक सीमित संसाधन है। इसके लिए अक्सर डीज़ल पंपों का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे जीवाश्म ईंधन का उत्सर्जन बढ़ता है।
नाइट्रोजन और फास्फोरस से भरपूर खाद भी नदियों और झीलों में रिसकर पहुँचती है, जिससे यूट्रोफिकेशन होता है – यानी शैवाल (एल्गी) का बेतहाशा बढ़ना, जो जलीय जीवों के लिए ऑक्सीजन की कमी पैदा करता है।
महमूद और अन्य लोगों का कहना है कि इसका असर मीठे पानी के इकोसिस्टम (जैसे नदियाँ और झीलें) और अंततः तटीय समुद्री वातावरण दोनों पर पड़ता है, जिन पर अलग-अलग तरह से असर होता है और जिनके लिए अलग-अलग मैनेजमेंट रणनीतियों की ज़रूरत होती है।
खास बात यह है कि स्टडी में यह भी पाया गया कि ज़मीन के इस्तेमाल के मामले में धान की खेती सुरक्षित प्लैनेटरी सीमाओं के भीतर रहती है; यह उन कुछ श्रेणियों में से एक है जहाँ अन्य प्रभावों की तुलना में ऐसा देखा गया।
दुनिया भर में मुख्य भोजन चावल की खेती, धरती के प्राकृतिक सिस्टम को नुकसान पहुंचा रही है, खासकर जलवायु परिवर्तन, पानी के इस्तेमाल और पोषक तत्वों से होने वाले प्रदूषण के मामले में।
एक स्टडी में बताया गया है कि पानी से भरे धान के खेतों से मीथेन (एक खतरनाक ग्रीनहाउस गैस) निकलती है और बहुत ज़्यादा सिंचाई से पानी के संसाधनों पर दबाव पड़ता है। मीथेन दुनिया की सबसे बड़ी जलवायु समस्याओं में से एक है। ऑक्सीजन की कमी वाले पानी भरे धान के खेतों में रहने वाले सूक्ष्मजीव कार्बनिक पदार्थों को तोड़ते हैं, जिससे उप-उत्पाद के रूप में मीथेन निकलती है।
रंकल और अन्य लोगों द्वारा ‘एनवायरनमेंटल साइंस एंड टेक्नोलॉजी’ में 2019 की एक स्टडी के अनुसार, धान की खेती से दुनिया भर में इंसानों द्वारा पैदा की जाने वाली मीथेन का 11% उत्सर्जन होता है। उसी स्टडी में यह भी दिखाया गया कि बारी-बारी से खेत को गीला और सूखा रखने की सिंचाई पद्धति से पानी बचाया जा सकता है और मिट्टी में समय-समय पर हवा (ऑक्सीजन) पहुँचाकर मीथेन उत्सर्जन को कम किया जा सकता है।