कल जो सड़कों पर थे, वह सिर्फ अपने लिए नहीं थे। वह अपनी पिछली पीढ़ी का भी खामियाज़ा भर रहे थे। वही पिछली पीढ़ी, जो अपने समय में इन सड़कों को सूनी रखने के लिए ज़िम्मेदार रही है और इन नौनिहालों की गुनहगार है।
कल लाठी खाने वाले वही बच्चे थे, जिनसे परीक्षा पर चर्चा के समय सरकार मुखातिब थी। एक तरफ़ा संवाद को नकारकर इन्होने बता दिया है कि कोई इन्हें उंगली पकड़कर चलाने की कोशिश न करे।
और यही वह पीढ़ी है जिसने अपनी पिछली पीढ़ी से बहुत लानत-मलामत भी सुनी है। लापरवाह होने की, निकम्मेपन की और गैरज़िम्मेदार होने की। इन सबके बीच कहीं तो संवाद की वह कड़ी टूटी है जिसे नहीं टूटना था।
सरकार को लगा कि लफ़्फ़ाज़ी से उन्होंने अपनी ज़िम्मेदारी पूरी कर ली है और सरपरस्तों को लगा कि अपनी हैसियत से ऊपर उठकर पढ़ाई कराने की जी तोड़ मेहनत करके उन्होंने इस पीढ़ी पर वह एहसान किया है, जिससे ये खुद महरूम रहे हैं।
सरपरस्त गाढ़ी-पतली, जमा की या उधार ली हर कमाई को इस आस में झोंकने में लगे थे कि जितनी रकम लगाएंगे उतना मीठा फल मिलेगा। अपने आस-पास नज़र आने वाली कुछ ऐसी ही मिसालें उनकी इस समझ को मज़बूत कर रही थीं। मगर फल पाने के लिए रोपा गया पौधा जिस ज़मीन में बोया था उसकी पड़ताल करने का वक़्त किसी के पास नहीं था।
जिन बच्चों की जानें गई हैं, उन्हें तो यह भी नहीं पता था कि उनके चुने गए भविष्य और पढ़े गए कोर्स के अलावा भी कोई दुनिया होती है। यह थी परवरिश या परिस्थतियां कि उनकी इस नाकामयाबी ने मौत के अलावा सभी रस्ते बंद कर दिए। जो बचे हैं वह किस मेंटल ट्रामा से गुज़रे उसका शायद ही हम में से कोई अंदाजा लगा सके।
सरकारी स्कूल में पढ़ने और पढ़ाने वालों के पास कोई विकल्प नहीं होता मगर प्राइवेट वालों ने तो दुनिया ही बदल दी। एक अच्छे स्कूल में एडमिशन दिलाने की कोशिश में हर मां-बाप भी जानलेवा मेनहत के दौर से गुज़रा है। इन मेहनतों में पिछले कुछ बरसों में जो बदलाव आए हैं, वह अफसोसनाक रहे हैं। स्कूलों ने एक से एक जायज़-और नाजायज़ शर्तें रखी है और सरपरस्तों ने उफ़ किए बगैर इन्हें माना है। अपनी पसंद के स्कूल में एडमिशन की चाहत में इस हद तक लोगों को गिरते देखा है कि लगता है प्राइमरी, नरसरी और केजी में ही पढ़कर बच्चा आला मुस्तक़बिल का दावेदार हो जाएगा। फिर यही बड़े भारी खर्च और अथक मेहनत कब बेहिसाब उम्मीदों में बदल जाती है, पता ही नहीं चलता और जो पता रह जाता है वह यह कि आपने इन बच्चों पर एक दिन में जितना खर्च किया है उतने में आपकी पूरी पढ़ाई हो जाया करती थी। ज़्यादातर इसका ताना देने से भी नहीं चूके हैं।
इस पनपती पीढ़ी के पास भी बहुत ज़ख्म हैं। आपकी दी हर मुमकिन सुख-सुविधा के बाद भी। जिन बच्चों ने अपने समय के दबाव को महसूस किया है, उसे महसूस करना आसान नहीं। हर बात पर जरेशन गैप का इलज़ाम लगाकर पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता।
एक खोखली और कीड़े लगी ज़मीन में लगाए गए पौधे पर आप कितनी भी लागत लगा दें। उसे महंगे से महंगे पानी से धोएं या उसके आस-पास एयर प्यूरीफायर लगाकर साफ हवा मुहैया कराएं। मगर इन सभी कोशिशों में यह भी तो देखना होगा कि मिट्टी में कीड़ा न लगा हो और उसको उपजाऊ भी होना चाहिए। सिर्फ परीक्षा पर चर्चा करने से मिटटी उपजाऊ नहीं बनती बल्कि हालात ऐसे हो जाते हैं कि मुक़ाबले का इम्तिहान सेना की मदद से करवाना पड़ता है।इन सबके बीच इस बात से कैसे इंकार किया जा सकता है कि कल जो सड़कों पर थे, वह सिर्फ अपने लिए नहीं थे। वह अपनी पिछली पीढ़ी का भी खामियाज़ा भर रहे थे। वही पिछली पीढ़ी, जो अपने समय में इन सड़कों को सूनी रखने के लिए ज़िम्मेदार रही है और इन नौनिहालों की गुनहगार है।