खगोलशास्त्रियों सहित बेशुमार लोगों ने बीती रात पूर्ण चंद्र ग्रहण का नज़ारा देखा। देखते ही देखते चाँद ‘ब्लड मून’ में बदल गया और लाल रंग होने के साथ यह सामान्य से ज़्यादा बड़ा नज़र आने लगा।

रविवार को घटने वाली इस घटना पर दुनियाभर की कई ऑब्ज़र्वेट्री की नज़र रही। इसे किसी टेलीस्कोप से या खुली आंखों से देखा बड़ी आसानी से देखा गया। ग्रहण के दौरान चाँद का लाल नज़र आना कोई मैजिक नहीं बल्कि एक खगोलीय घटना है जिसके पीछे की साइंस भी जान लीजिए।
ग्रहण के दौरान पृथ्वी के वातावरण में जितने ज़्यादा बादल या धूल होगी, चांद उतना ही ज़्यादा लाल नज़र आएगा। दरअसल चंद्रमा का लाल रंग “रेली स्कैटरिंग” नामक प्रक्रिया के कारण होता है। इसी प्रक्रिया के कारण आकाश का रंग नीला दिखता है, जबकि सूर्यास्त और सूर्योदय के वक्त सूरज लाल दिखता है।
सूर्योदय या सूर्यास्त के वक़्त की बची हुई लाल किरणें पृथ्वी के वातावरण से होते हुए चंद्र ग्रहण के दौरान चांद की सतह तक पहुंच जाती हैं। यही कारण है कि ग्रहण के दौरान चंद्रमा लाल नज़र आता है।
दरअसल छोटी वेवलेंथ की नीली रोशनी अधिक बिखरने से लाल रंग सीधी दिशा में आगे बढ़ता है जिसे इंसानी आँखें आराम से देख पाती हैं। सूर्य की किरणें भीसूर्योदय और सूर्यास्त के वक़्त धरती के वायुमंडल की एक मोटी परत को पार करते हुए इंसानी आंखों तक पहुंचती हैं।
यह वर्ष के आख़िरी चंद्र ग्रहण को पूरे भारत में देखा गया। भारत सहित एशिया के अधिकांश देशों के अलावा यह घटना पूर्वी अफ़्रीका, यूरोप और पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया और यह खगोलीय घटना शुरू से अंत तक स्पष्ट रूप से देखी गई।
पृथ्वी की छाया ने चांद की सतह को रविवार रात 9:57 बजे से ढकना शुरू किया, जबकि इस बीच अधिकांश हिस्सों में बादलों के कारण बड़ी संख्या में लोग इस नज़ारे से वंचित रह गए। हालाँकि कुछ स्थानों पर इसे लुका-छिपी के खेल के साथ देखा गया।
भारतीय समय के मुताबिक़ चंद्र ग्रहण की शुरुआत 7 सितंबर को रात 8:58 बजे हुई। इसके पूर्ण चंद्र ग्रहण यानी ब्लड मून स्थिति में पहुँचने का समय रात 11:48 बजे से 12:22 बजे तक रहा। जबकि इसकी समाप्ति का समय 8 सितंबर सुबह 2:25 बजे रहा।
देश के जिन अधिकांश राज्यों में यह पूर्ण चंद्र ग्रहण देखा गया उनमें लखनऊ सहित दिल्ली, चंडीगढ़, जयपुर के अलावा पश्चिम और दक्षिण भारत भारत में भी इसे लोगों ने देखा।













