सुप्रीम कोर्ट ने बीते दिन वंदे मातरम के अनिवार्य गायन पर विवाद मामले में सुनवाई पर टिप्पणी की। कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि हम उम्मीद करते हैं कि धार्मिक कारणों से वंदे मातरम नहीं गाने वाले व्यक्ति को किसी आपराधिक मामले का सामना नहीं करना पड़ेगा।
अदालत ने केंद्र से जवाब मांगते हुए कहा कि वह इस मामले में संवैधानिक सवालों की जांच कर रही है। साथ ही यह भी कहा कि खास तौर से यह देखना जरूरी है कि राष्ट्रीय गीत के सम्मान और व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता के बीच कानून किस तरह संतुलन स्थापित करता है।
गौरतलब है कि याचिका में विशेष रूप से यह सवाल उठाया गया है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी धार्मिक मान्यता या अंतरात्मा के कारण वंदे मातरम नहीं गाता तो क्या उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है।
इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस वी. मोहना और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंचकर रही है। वरिष्ठ अधिवक्ता एस मुरलीधर ने याचिकाकर्ता की तरफ से राष्ट्रीय गीत से जुड़े नए कानूनी प्रावधान और केंद्र सरकार की ओर से जारी निर्देशों को दी गई चुनौती पर अपनी दलील पेश की।
बताते चलें कि वंदे मातरम के गाने से जुड़ा यह मामला उस कानूनी बदलाव से संबंधित है जिसके तहत वंदे मातरम को राष्ट्रीय गान जन गण मन के समान कानूनी संरक्षण देने का प्रावधान किया गया है।
बताते चलें कि संसद की ओर से संशोधन पारित किए जाने के बाद राष्ट्रीय गीत के गायन को जानबूझकर रोकना या गेट समय व्यवधान पैदा करने को दंडनीय अपराध बनाया गया है। तभी से वंदे मातरम के गायन पर विवाद है।
शीर्ष अदालत ने केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से सुनवाई के समय इस पहलू पर जवाब मांगा। अदालत की टिप्पणी का मूल आशय था कि धार्मिक कारणों से गीत न गाने वाले व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक परिणाम नहीं होना चाहिए। इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 25 के तहत अंतरात्मा तथा धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा है।
वंदे मातरम् को संसद में कानूनी संशोधन के जरिए राष्ट्रीय गान के साथ संबंधित कानून के दायरे में लाया गया है। कानून के तहत किसी सभा में राष्ट्रीय गीत के गायन को जानबूझकर रोकना या उसमें व्यवधान पैदा करना आपराधिक बनाया गया है।
अब संशोधन के बाद इस अपराध के लिए जेल या अन्य दंड का प्रावधान लागू हो सकता है। इसी बदलाव पर अब सुप्रीम कोर्ट के सामने अब यह संवैधानिक सवाल आ गया है-कि क्या राष्ट्रीय गीत का कानूनी संरक्षण इतना व्यापक हो सकता है कि धार्मिक या अंतरात्मा के आधार पर उसे न गाने वाले व्यक्ति पर भी आपराधिक कार्रवाई का खतरा पैदा हो?
अभी तक यदि किसी व्यक्ति को गीत गाने के लिए बाध्य किया जाता अथवा उसके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई होने पर वह अदालत का रुख कर सकता था। लेकिन अब संसद में कानून में बदलाव किया के कारण यह मामला केवल सलाहकारी नहीं रह गया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, इस बीच सुनवाई के दौरान एक अलग विवाद उस समय सामने आया जब वरिष्ठ अधिवक्ता एस मुरलीधर ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की उस टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताई जिसमें उन्होंने कानून बनाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाने वालों के संदर्भ में ‘नक्सलियों’ का उल्लेख किया था।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और टीएम कृष्णा की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील डॉ एस मुरलीधरन के बीच इस सुनवाई के दौरान खासी बहस हुई। मुरलीधर का कहना है कि ऐसी भाषा किसी कानून अधिकारी को शोभा नहीं देती और उन्होंने टिप्पणी वापस लेने की मांग की। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने इस विवाद पर अनावश्यक तनाव और भावनात्मक बहस से बचने की सलाह दी। बाद में उन्होंने कहा कि अदालत फिलहाल केवल संवैधानिक और कानूनी सवालों पर ध्यान केंद्रित कर रही है।