दक्षिण अफ़्रीका के संवैधानिक न्यायालय ने पतियों को अपनी पत्नियों का उपनाम अपनाने से रोकने वाले क़ानून को पलटते हुए कहा है कि पति अपनी पत्नियों का उपनाम अपना सकते हैं।

दक्षिण अफ्रीका की सर्वोच्च अदालत ने जीवनसाथी से जुड़े एक ऐतिहासिक फैसले में पतियों को अपनी पत्नियों के उपनाम अपनाने की इजाज़त दे दी है। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा और संसद को अगले दो वर्षों के भीतर नए फैसले के अनुरूप कानून को अपडेट करने का निर्देश दिया।
अदालत ने इस फैसले में कहा है कि वर्तमान जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम 1992, केवल महिलाओं को विवाह के बाद अपना नाम बदलने की अनुमति देता है। यह हक़ पुरुषों को नहीं मिला है। अदालत ने इस कानून को “उपनिवेशवाद का अवशेष” और “लैंगिक भेदभाव” बताते हुए इसे अमान्य घोषित कर दिया है।
यह मामला 2024 में दो विवाहित जोड़ों द्वारा दायर किया गया था, जिन्होंने गृह मंत्रालय पर लैंगिक भेदभाव का आरोप लगाया था। एक जोड़ा अपने नामों को मिलाकर एक हाइफ़नेटेड उपनाम (hyphenated surname) बनाना चाहता था, जबकि दूसरा चाहता था कि पति अपनी पत्नी का उपनाम अपनाए।
रिपोर्ट के अनुसार, हेनरी वैन डेर मेरवे को अपनी पत्नी जाना जॉर्डन का उपनाम अपनाने का अधिकार नहीं दिया गया, जबकि एंड्रियास निकोलस बोर्नमैन अपने उपनाम में अपनी पत्नी जेस डोनेली-बोर्नमैन का उपनाम डोनेली नहीं जोड़ सके।
यह मामला दायर करने वाले दो दंपतियों की जीत में, संवैधानिक न्यायालय ने फैसला सुनाया कि यह कानून एक “औपनिवेशिक आयात” है जो लिंग-आधारित भेदभाव के समान है।
यह कानून दक्षिण अफ्रीका में श्वेत अल्पसंख्यकों के शासन के वर्षों के दौरान लागू किया गया था। इस फैसले को लागू करने के लिए अब संसद को जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम और उसके नियमों में संशोधन करना होगा। गौरतलब है कि पत्नी द्वारा पति का उपनाम अपनाने की प्रथा रोमन-डच कानून में मौजूद थी, और इस तरह इसे दक्षिण अफ्रीकी सामान्य कानून में शामिल किया गया।
इस फैसले पर सोशल मीडिया पर गरमागरम बहस छिड़ गई, कुछ लोगों ने इसे दक्षिण अफ्रीका में लैंगिक समानता की दिशा में एक बड़ा कदम बताया, जबकि अन्य ने इसे पारंपरिक मूल्यों के विरुद्ध कदम बताया।













