नेपाल में आम चुनाव में रैपर और काठमांडू के मेयर रहे बालेन शाह ने पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को 50 हजार वोटों से शिकस्त दे दी है। जारी मतगणना के अबतक के अपडेट के अनुसार, 165 सीटों पर शुरुआती रुझान आ चुके हैं।

नेपाल के आम चुनाव में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) के बालेन शाह और ओली झापा-5 सीट से चुनाव लड़ रहे थे। बालेन शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। यहां बालेन शाह को 68,348 वोट मिले, जबकि केपी शर्मा ओली को 18,734 वोट मिले। आरएसपी ने अब तक 62 सीटें जीत ली हैं, जबकि 60 सीटों पर आगे चल रही है। यह पार्टी सिर्फ 4 साल पहले एक पत्रकार रहे रबि लामिछाने ने बनाई थी। अंतिम परिणाम आने में अभी समय है। पहाड़ी क्षेत्र के कारण नेपाल में मतगणना आम तौर पर धीमी होती है।
35 वर्षीय बालेन शाह ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है और कई साल से नेपाल के हिप-हॉप संगीत जगत ‘नेफहॉप’ से जुड़े रहे हैं। मई 2022 में बालेन शाह पहली बार नेपाल की राजधानी काठमांडू के मेयर बने। बालेन का जन्म काठमांडू के गैर गाउन में 1990 में हुआ था। बालेन के पिता राम नारायण शाह आयुर्वेद के डॉक्टर हैं और इनकी माँ का नाम ध्रुवदेवी शाह है।
बीते वर्ष सोशल मीडिया पर प्रतिबंध के ख़िलाफ़ होने वाले प्रदर्शनों के दौरान युवाओं के बीच बालें की लोकप्रियता बढ़ गई। इन प्रदर्शनों में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और आर्थिक ठहराव को लेकर भी गुस्सा था। याद दिला दें कि ओली को भारत विरोधी नेता माना जाता है। उन्होंने झापा-5 सीट से 2017 और 2022 का चुनाव जीता था।
नेपाल में बीते वर्ष सितंबर में हुए हिंसक प्रदर्शनों के बाद 5 मार्च को हुए चुनाव में करीब 58% जनता ने मतदान किया। वोटों की गिनती पूरी होने में 3 से 4 दिन लगने की उम्मीद है। चुनाव आयोग ने कहा है कि 9 मार्च तक काउंटिंग पूरी करने की कोशिश की जाएगी।
बताते चलें कि नेपाल में चुनाव प्रणाली से होता है। यानी यहां दो तरीकों से सांसद चुने जाते हैं- सीधे चुनाव से और पार्टी को मिले कुल वोट के हिसाब से।
पहले नेपाल में संसद की 275 में से 165 सीटों पर सीधे चुनाव होता है। हर इलाके (निर्वाचन क्षेत्र) में लोग अपने उम्मीदवार को वोट देते हैं। जिस उम्मीदवार को सबसे ज्यादा वोट मिलते हैं, वही जीतता है।
फिर दूसरी व्यवस्था के तहत वोट % के आधार पर सीटें तय होती हैं, जिसमे बाकी बची 110 सीटें पार्टियों को मिले कुल वोट प्रतिशत के आधार पर मिलती हैं। इसमें वोटर किसी उम्मीदवार को नहीं बल्कि किसी पार्टी को वोट देती है। पूरे देश में पार्टी को जितने प्रतिशत वोट मिलते हैं, उसी हिसाब से उन्हें संसद में सीटें दी जाती हैं।
इस प्रणाली को अपनाने का मकसद यह है कि छोटे दलों और अलग-अलग सामाजिक समूहों को भी संसद में जगह मिल सके और कोई एक पार्टी पूरी तरह हावी न होने पाए।











