एक हालिया अध्ययन से पता चला है कि संवेदनशील स्वभाव वाले लोगों में मानसिक बीमारियों, खासकर अवसाद और चिंता से पीड़ित होने की संभावना ज़्यादा होती है। इस शोध में संवेदनशीलता और अवसाद, चिंता, ओसीडी, तकलीफ के बाद के तनाव विकार (पीटीएसडी), एगोराफोबिया और सामाजिक चिंता विकार जैसी स्थितियों के बीच संबंध पाया गया है।

यह अध्ययन क्लिनिकल साइकोलॉजिकल साइंस पत्रिका में प्रकाशित हुआ। विशेषज्ञों के अनुसार, लगभग 31 प्रतिशत आबादी को अत्यधिक संवेदनशील माना जा सकता है, ये लोग आसपास के वातावरण, रोशनी, शोर और दूसरों के मूड पर ज़्यादा प्रतिक्रिया करते हैं।
इस शोध के प्रमुख, क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी ऑफ़ लंदन के मनोवैज्ञानिक टॉम फॉल्केनस्टाइन ने कहा कि यह संवेदनशीलता और मानसिक स्वास्थ्य के प्रभावों पर अब तक का सबसे बड़ा व्यवस्थित अध्ययन और इस विषय पर पहला मेटा-विश्लेषण है।
सरे विश्वविद्यालय के एक नए शोध में पाया गया है कि अत्यधिक संवेदनशील लोगों में मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ विकसित होने का खतरा अधिक होता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि मानसिक स्वास्थ्य उपचार और मूल्यांकन में संवेदनशीलता को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है, जबकि यही विशेषता अवसाद, तकलीफ के बाद के तनाव विकार (PTSD) और अन्य मनोदशा विकारों से जुड़ी होती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि कुछ लोग संवेदी सूचनाओं को ज़्यादा गहराई से लेते हैं, जिससे वे आसानी से जज़्बाती और अति-उत्तेजित हो जाते हैं।
अध्ययन के लिए 33 अलग-अलग अध्ययनों के आंकड़ों की समीक्षा की गई और कुल 12,700 लोगों के मानसिक स्वास्थ्य और संवेदनशीलता के बारे में जानकारी एकत्र की गई। विश्वविद्यालय में विकासात्मक मनोविज्ञान के प्रोफेसर माइकल प्लूस ने इस प्रमाण को “सम्मोहक” बताया।
विशेषज्ञों ने कहा कि यदि उपचार के दौरान संवेदनशीलता को ध्यान में रखा जाए, तो ऐसे व्यक्तियों को माइंडफुलनेस जैसी तकनीकों से अधिक लाभ हो सकता है, जिससे मानसिक स्वास्थ्य में सुधार करने में मदद मिलेगी।
इसके अलावा, अध्ययन यह सुझाव देता है कि भविष्य के शोध में विभिन्न स्तर की संवेदनशीलता वाले रोगियों के लिए विशिष्ट मनोवैज्ञानिक उपचारों, जैसे संज्ञानात्मक पुनर्गठन, माइंडफुलनेस और भावना-केंद्रित हस्तक्षेप, की प्रभावशीलता का आकलन किया जाना चाहिए।












