मनुष्य ने इस धरती के बनने में नदियों के सहयोग को भुला दिया है। लोभ और लाभ की आदत के चलते नदियां भयंकर संकट में है। नदियों के विनाश में बाजारवाद का बढ़ता प्रभाव भी एक प्रमुख कारक है। पृथ्वी अब वैश्विक जल दिवालियापन के दौर में प्रवेश कर चुकी है। सेंट्रल फॉर फाइनेंशियल एकाउंटिबिलिटी की यह रिपोर्ट के कुछ अंश ऐसे ही तथ्यों पर प्रकाश डालती है।
भारत को नदियों का देश माना जाता है। यहाँ छोटी और बड़ी नदियों को मिलाकर लगभग 4000 से अधिक नदियां है। इस धरती पर नदियां जीवनदायिनी है। जीवन देने वाली इन नदियों को पूजा जाता है। मगर आज इन नदियों की हालत दयनीय है। विकास के क्रम में इनकी सुध लेने वाले बहुत कम जबकि नुकसान पहुँचाने वाले इतने ज़्यादा हैं कि इन नदियों का अस्तित्व बुरी तरह खतरे में है।
अधिकतर नदियां प्रदूषित
रिपोर्ट के मुताबिक़, देश में 521 नदियों के पानी की निगरानी करने वाले प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का कहना है कि देश की 198 नदियां ही स्वच्छ हैं। इनमें अधिकांश छोटी नदियां हैं। शहरीकरण, औद्योगीकरण तथा अनियोजित विकास के कारण पिछले कुछ दशकों से नदियों की स्थिति अत्यंत चिंताजनक होती जा रही है। कई सहायक नदियों का अस्तित्व ही समाप्त हो गया है।
लाखों जल धाराएं गायब
रिपोर्ट में आईआईटी धनबाद संस्थान के पर्यावरण विज्ञान इंजिनियरिंग विभाग के प्रोफेसर अंशु माली और उनकी टीम ने शोध में खुलासा किया है कि पिछले 50 वर्षों में गंगा नदी की करीब 18 लाख जल धाराएं गायब हो गई है। उन्होंने झारखंड, पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में 7 छोटी नदियों और उनके 56 वाटर शेड्स का अध्ययन किया, जो गंगा जो गंगा में जाकर मिलती है। नदियों में प्रदूषण का असल खमियाजा तो कृषि क्षेत्र पर पड़ता है।
सीमा से अधिक दोहन
दुनिया के अनेक नदी घाटियों और एक्विफर में दीर्घकालिक जल उपयोग, प्राकृतिक पुनर्भरण और सुरक्षित दोहन की सीमाओं से कहीं अधिक हो चुका है। एक्वीफर जमीन के नीचे मौजूद बालू, बजरी, मिट्टी या चट्टानों की वह पारगम्य परत है जो पानी को अपने भीतर संचित रखती है और भूजल (Groundwater) का संचार करती है
संस्थागत व्यवस्था की कमी
कई नदी घाटियों में कानूनी जल अधिकार, अनौपचारिक अपेक्षाएं और विकास संबंधी वादे, क्षरित जल-वहनीय क्षमता से कहीं अधिक हो चुका है, जबकि जल दिवालियापन से निपटने के लिए प्रभावी संस्थागत व्यवस्थाएं मौजूद नहीं है।
छोटी नदियों की अनदेखी
रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि जब कभी नदियों पर बात होती है तो ज्यादातर बड़ी नदियों पर केंद्रित होती है। लेकिन इन सदानीरा नदियों का भरपूर जल देने वाली छोटी नदियों पर हमारा ध्यान नहीं जाता है, जो आज अभूतपूर्व संकट से गुजर रही हैं। इनमें से कई छोटी-बड़ी नदियां या तो सूख चुकी हैं या फिर बरसाती नाले बनकर रह गई हैं। अगर हमें बड़ी नदियों को बचाना है तो छोटी नदियों पर ध्यान देना होगा। छोटी नदियों का संरक्षण जरूरी है।
अवैध खनन पर लगाम ज़रूरी
रेत खनन नदियों के इकोसिस्टम को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है। इसके लिए अवैध रेत खनन की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए एक विशेष निगरानी दल का गठन किया जाना चाहिए। अवैध खनन करने वालों पर कठोर कार्रवाई की जाए और उनके उपकरण जब्त किए जाएं।
वैकल्पिक साधनों पर काम किया जाना ज़रूरी
निर्माण कार्यों के लिए रेत के वैकल्पिक साधनों की खोज और उपयोग को प्रोत्साहित किया जाए। माइन्स एंड मिनरल रेगुलेशन एक्ट 1957 में प्रमुख और उपखनिज को परिभाषित किया है। 1957 से अबतक स्थिति बदल चुकी है और रेत का इस्तेमाल कई गुना बढ़ गया है। रेत खनन के कारण पर्यावरण पर हो रहे असर की व्यापकता को देखते हुए इसे लघु नहीं, बल्कि प्रमुख खनिज में शामिल कर सख्त पर्यावरणीय अनुमति का प्रावधान किया जाना चाहिए।
पर्यावरणीय प्रबंधन में अधिक विशेषज्ञ शामिल हों
वर्तमान दौर में नदियां कम्पनियों, कॉर्पोरेट्स और सरकार के मुनाफा कमाने का साधन बन चुकी है। नदियों का प्रशासकीय प्रबंधन की जगह पर्यावरणीय प्रबंधन की दृष्टी से निगरानी तंत्र विकसित करना चाहिए। जिसमें पारिस्थितिकीय तंत्र, जलवायू परिवर्तन और जैव विविधता की समझ रखने वाले विशेषज्ञ को शामिल किया जाना आवश्यक है। नदी पर बने बांधों से कई लाभ मिले हैं, वहीं इसने आदिवासी और मछुआरा समुदायों को प्रभावित किया है और नदी पारिस्थितिक तंत्र को नुकसान पहुंचाया है।
बांधों और अवरोधों को हटाना ज़रूरी
डाउन टू अर्थ के रिचर्ड महापात्रा के अनुसार दुनिया भर में नदियों पर अब तक 62,000 बड़े बांध और लाखों छोटे अवरोध बनाए जा चुके हैं। डेम रिमूवल यूरोप ( डीआरई) के अनुसार, 2024 में 23 देशों ने 542 बाधाओं को हटाया है। नदियों के स्वास्थ्य को बहाल करने के लिए बांधों और अवरोधों को हटाना अब एक तेजी से स्वीकार किया जा रहा उपाय बन चुका है, और इसमें खास तौर पर यूरोप और उत्तर अमरीका में तेजी आई है, जहां पुराने, असुरक्षित, अनुपयोगी या आर्थिक रूप से अलाभकारी बांधों को हटाया जा रहा है। नर्मदा नदी आज मानवीय हस्तक्षेप, जलवायु परिवर्तन और अंधाधुंध दोहन के कारण गहरे पारिस्थितिकी संकट से जूझ रही है।
नर्मदा घाटी में 30 बङे बांध प्रस्तावित है। इसमें से कई बड़े बांध बनाए जा चुके हैं। अतः उन सभी बांधों का नर्मदा नदी पर पङने वाले उसके वहन क्षमता और संचयी प्रभावों (कम्यूलेटिव ईम्पेकट) का एकत्रित अध्ययन पर्यावरणीय दृष्टि से आवश्यक है। अतः नर्मदा घाटी में निर्मित हुए बांधों के प्रभाव को एकत्रित अध्ययन के बाद ही कोई अन्य बांध बनाने पर विचार होना चाहिए।
नदी को केवल आर्थिक उपयोग की वस्तु मानने के बजाय एक जीवंत पारिस्थितिक तंत्र के रूप में देखने की दृष्टि विकसित करनी होगी। विश्व नदी दिवस हमें इसी बुनियादी सवाल की ओर लौटने का अवसर देता है कि हम नदियों से कितना ले सकते हैं, यह पूछने के साथ यह भी तय करना होगा कि नदियों को जीवित रखने के लिए हम कितना वापस देंगे। आखिर नदी बचेगी तभी जल बचेगा, जल बचेगा तभी जीवन और सभ्यता बचेगी।