आज विश्व पर्यावरण दिवस है। विश्व पर्यावरण दिवस की इस साल की थीम है- “प्लास्टिक प्रदूषण को हराएँ”। हर साल 5 जून को मनाया जाने वाला यह दिन हमें याद दिलाता है कि मानवता ने प्रकृति को कितना नुक़सान पहुँचाया है।

यह दिन आगाह भी करता है कि अब आगे इस संकट से किस तरह से निपटना है। प्रकृति की हिफाज़त को लेकर अगर हमने तुरन्त क़दम नहीं उठाए, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए पृथ्वी रहने योग्य नहीं बचेगी।
दुनिया भर में हर साल, 40 करोड़ टन प्लास्टिक का उत्पादन होता है, जिसमें से क़रीब 50 फ़ीसदी केवल एक बार ही इस्तेमाल में लाने के लिए तयैार किया जाता है। महज़ 10 प्रतिशत प्लास्टिक की ही री-सायकलिंग की जाती है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम द्वारा प्लास्टिक प्रदुषण के खतरों से निपटने के लिए एक वैश्विक युवा मुहिम चलाई गई है। ‘टाइड टर्नर्स प्लास्टिक चैलेंज’ स्थानीय स्तर पर सतत प्रयासों को आगे बढ़ाने का काम करता है।
1.9 से 2.3 करोड़ टन प्लास्टिक हमारे झीलों, नदियों और महासागरों में प्रवेश करता है। अगर वर्तमान रुझान जारी रहे, तो 2040 तक प्लास्टिक उत्पादन दोगुना हो जाएगा और 2060 तक यह सालाना 1.2 अरब टन तक पहुँच सकता है।
प्लास्टिक प्रदूषण अब केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं रहा, यह स्वास्थ्य एवं आर्थिक बोझ भी बन गया है। हमारी पृथ्वी के हर कोने को तो दूषित करने वाला प्लास्टिक प्रदूषण पारिस्थितिकी तंत्रों, वन्यजीवन व मानव स्वास्थ्य के लिए भी ख़तरा है।
माइक्रोप्लास्टिक, प्लास्टिक के महीन कण अब हमारे भोजन, जल, वायु, फेफड़ों, धमनियों, दिमाग और माँ के दूध में भी पाए जा रहे हैं।
इस विशाल चुनौती से निपटने के लिए, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) का ‘टाइड टर्नर्स प्लास्टिक चैलेंज’ (Tide Turners Plastic Challenge) एक वैश्विक युवा मुहिम है जोकि प्लास्टिक प्रदूषण, कचरे से निपटने पर लक्षित है।
ये पहल 11 से 35 वर्ष के युवाओं को नेतृत्व की भूमिका में लाकर उन्हें प्लास्टिक के उपयोग को कम करने, व्यवहार में बदलाव लाने और स्थानीय स्तर पर सतत प्रयासों को आगे बढ़ाने के लिए सशक्त बनाता है।
केनया से शुरू हुई यह पहल अब 61 देशों में फैल चुकी है, लगभग 10 लाख युवजन इस मुहिम से जुड़ चुके हैं।
भारत में भी यह अभियान तेज़ी से आगे बढ़ा है। 2019 से अब तक 7.5 लाख से अधिक युवा इसका हिस्सा बन चुके हैं, जिनमें से 1.5 लाख से ज़्यादा, 500 से अधिक गाँवों से हैं। ख़ास बात यह है कि इन कार्यक्रमों में 51 प्रतिशत भागेदारी महिलाओं व लड़कियों की रही है।
इसके अलावा देश भर के स्कूलों और सरकारी संस्थानों में अब पर्यावरण के प्रति जागरूकता को नीति, शिक्षा और दैनिक जीवन में शामिल किया जा रहा है।















