मुस्लिम पति अपनी पत्नी की अनुमति के बिना दूसरी शादी नहीं कर सकता। यह फैसला केरल उच्च न्यायालय ने ओर से दिया गया है। दक्षिणी राज्य केरल के उच्च न्यायालय ने एक फैसले में आदेश दिया है कि मुस्लिम पति अपनी पहली पत्नी की अनुमति के बिना दोबारा शादी नहीं कर सकता। अदालत के फैसले में कहा गया है कि पहली पत्नी की आपत्ति की स्थिति में रजिस्ट्रार को मुस्लिम पति की दूसरी शादी की कार्यवाही शुरू करने से बचना चाहिए।

केरल हाईकोर्ट का कहना है कि यदि कोई मुस्लिम व्यक्ति पहली पत्नी के होते हुए केरल विवाह पंजीकरण (सामान्य) नियम 2008 के तहत अपनी दूसरी शादी का रजिस्ट्रेशन कराना चाहता है, तो उस स्थिति में उसकी पहली पत्नी से भी इजाज़त लेना होगी कि वह इसके लिए सहमत है या नहीं।
गौरतलब है कि जस्टिस पी वी कुन्हिकृष्णन ने फैसले में कहा कि ऐसी स्थिति में धर्म गौण हो जाता है और संवैधानिक अधिकार सबसे ऊपर रहते हैं। अदालत ने साफ किया कि जब दूसरी शादी के रजिस्ट्रेशन का सवाल आता है तो रस्मी कानून लागू नहीं होते।
कोर्ट के मुताबिक़, यदि पहली पत्नी मौजूद है तो यह अदालत उसकी भावनाओं को नजरअंदाज नहीं कर सकती, जब उसका पति देश के कानून के अनुसार अपनी दूसरी शादी का रजिस्ट्रेशन कराता है। इस स्थिति में न्यायाधीश का कहना है कि उन्हें यकीन है कि 99.99 प्रतिशत मुस्लिम महिलाएं अपने पति की दूसरी शादी के खिलाफ होंगी, यदि उनका रिश्ता पति के साथ कायम है।
हाईकोर्टके अनुसार, मुस्लिम महिलाओं को भी अपने पतियों द्वारा पुनर्विवाह करने पर सुनवाई का अवसर मिलना चाहिए, कम से कम दूसरे विवाह के पंजीकरण के क्रम में। इस फैसले के साथ कोर्ट ने याचिकाकर्ता और उसकी दूसरी पत्नी की अर्जी खारिज कर दी।
केरल उच्च न्यायालय ने कहा कि रजिस्ट्रार को मुस्लिम पति की दूसरी शादी के पंजीकरण की प्रक्रिया रोक देनी चाहिए और पक्षकारों को सक्षम सिविल न्यायालय के पास भेजना चाहिए, ताकि विवाह की वैधता और वैधता का निर्धारण वहाँ व्यक्तिगत कानूनों के तहत किया जा सके।













