मानवाधिकारों का गम्भीर उल्लंघन से पनपी आधुनिक दासता समाज के नैतिक ढाँचे पर चोट करती है

तकनीक ने शोषण के नए रास्ते खोल दिए हैं। आज ऑनलाइन मंचों और सोशल मीडिया के माध्यम से बच्चों और वंचित लोगों को फँसाया जा रहा है। आधुनिक दासता न केवल अतीत की भयावह स्मृति है, बल्कि वर्तमान में भी, एक ख़तरनाक वास्तविकता के रूप में, लोगों के बुनियादी मानवाधिकारों को सीधे चुनौती दे रही है।

मानवाधिकारों का गम्भीर उल्लंघन से पनपी आधुनिक दासता समाज के नैतिक ढाँचे पर चोट करती है

आईएलओ यानी अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन का कहना है कि दुनिया में 5 करोड़ लोग, आधुनिक दासता के शिकार हैं, जिसमें जबरन मज़दूरी, जबरन विवाह और यौन शोषण जैसी स्थितियाँ शामिल हैं। उससे भी यह है कि जबरन मज़दूरी में फँसे लोगों में, 12 प्रतिशत बच्चे हैं, और इनमें से आधे से अधिक बच्चे, व्यावसायिक यौन शोषण के शिकार हैं। हाल के वर्षों में, इस कुचक्र में फँसने वाले लोगों की संख्या में, क़रीब 1 करोड़ तक की वृद्धि हुई है।

यूएन मीडिया के आंकड़े बताते हैं कि जबरन श्रम के 52 फ़ीसदी और जबरन विवाह के लगभग 25 प्रतिशत मामले, उच्चतर-मध्य आय और उच्च-आय वाले देशों में दर्ज किए जाते हैं। इन देशों में जटिल आपूर्ति शृंखलाएँ, अनौपचारिक काम और प्रवासी मज़दूरों की सुरक्षा की कमी, इसकी जड़ों को और गहरा बनाती है।

जिनीवा में 26 सितम्बर 1926 को अपनाई गई दासता (निरोधक) सन्धि (Slavery Convention) को, वर्ष 2026 में 100 साल पूरे हो जाएँगे। मगर, समकालीन दासता अब भी व्यापक स्तर पर मौजूद होने के कारण, इस सन्धि की ज़रूरत आज भी बनी हुई है।

मानवाधिकारों का गम्भीर उल्लंघन
संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि जबरन श्रम से हर साल क़रीब 236 अरब डॉलर का मुनाफ़ा कमाया जाता है, जो मूल रूप से श्रमिकों का छीन लिया गया पारिश्रमिक है। इस संकट से कृषि, मछली पकड़ने, उत्पादन, निर्माण, खनन से लेकर घरेलू काम और यौन शोषण तक, लगभग हर उद्योग प्रभावित है।

मानवाधिकारों की दृष्टि से यह स्थिति इसलिए गम्भीर है, क्योंकि दासता इनसान को एक वस्तु में बदल देती है, उसकी स्वतंत्रता, सुरक्षा, गरिमा, काम की शर्तें, शिक्षा, स्वास्थ्य और पारिवारिक जीवन जैसे सभी मूलभूत अधिकारों को छीन लेती है।

दासता झेल रहे लोग हिंसा, ख़तरनाक परिस्थितियों और यौन शोषण का सामना करते हैं, और रिहाई के बाद भी सामाजिक कलंक, मानसिक आघात और असुरक्षा से जूझते रहते हैं।

यह न केवल व्यक्ति के अधिकारों का हनन है, बल्कि समानता और स्वतंत्रता जैसे उन मूल्यों पर भी चोट है, जिन्हें सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणापत्र (UDHR) ने 1948 में सभी के लिए सुनिश्चित किया था।

इसीलिए विशेषज्ञ मानते हैं कि बढ़ती मांग, कमज़ोर शासन, भ्रष्टाचार और सामाजिक असुरक्षा, आधुनिक दासता को, मानवाधिकारों के सबसे गम्भीर उल्लंघनों में से एक बनाते हैं, जो पूरे समाज के नैतिक ढाँचे पर चोट करती है।

जबकि मानवाधिकार हर व्यक्ति को उसकी जाति, लिंग, धर्म, राष्ट्रीयता या सामाजिक स्थिति के दायरे की परवाह किए बिना, समान गरिमा और सुरक्षा के साथ जीवन जीने का अवसर देते हैं। ये अधिकार हर इनसान को, जन्म के साथ ही प्राप्त होते हैं, किसी देश या सरकार द्वारा नहीं प्रदान किए जाते। मानवाधिकार को अविच्छिन्न और अविभाज्य माना जाता है।

द्वितीय विश्व युद्ध के अत्याचारों से सीख लेते हुए 1948 में अपनाई गई मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा, दुनिया का पहला व्यापक दस्तावेज़ था, जिसने समानता, स्वतंत्रता और यातना से सुरक्षा जैसी मूलभूत स्वतंत्रताओं को सार्वभौमिक रूप से मान्यता दी। इसके 30 अनुच्छेद आधुनिक मानवाधिकार क़ानून की बुनियाद हैं और यह दस्तावेज़, 80 से अधिक अन्तरराष्ट्रीय सन्धियों व समझौतों का प्रेरणा स्रोत बना।

दासता समाप्ति के लिए अनेक स्तरों पर कार्रवाई की ज़रूरत है। इसके लिए, देशों की सरकारों को मज़बूत क़ानून बनाने और उनका सख़्त पालन सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। साथ ही समाज में निर्बल लोगों के लिए सुरक्षा, सुरक्षित प्रवास, शिक्षा और आर्थिक अवसर प्रदान करना महत्वपूर्ण है, ताकि वे जोखिम वाली परिस्थितियों में नहीं फँसें। इसके अलावा, व्यवसायों को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी आपूर्ति श्रृंखला पारदर्शी और शोषण मुक्त हो। दासता के चंगुल से छूटे पीड़ितों को क़ानूनी सहायता, परामर्श, सुरक्षित आवास और कौशल प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए, ताकि वे फिर से शोषण के शिकार नहीं हों।

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