चुनावी प्रचार के लिए इस समय सोशल मीडिया एक ऐसा कारगर टूल बन चुका है जिसने पार्टियों को लुभाने में पुराने तरीकों को पछाड़ दिया है। यही कारण है कि अब चुनावी दल, चुनाव प्रचार के लिए जमकर इसकी मदद लेते हैं।
इस बार भी पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरलम और असम के विधानसभा चुनावों में इस माध्यम का जमकर उपयोग हुआ है। मेदिअय रिपोर्ट्स के मुताबिक़, चुनावों के दौरान उपलब्ध डेटा बताता है कि इन राज्यों में प्रमुख पार्टियां डिजिटल प्रचार पर बढ़ चढ़ कर खर्च कर रही हैं।
गौरतलब है कि एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के मुताबिक़, मेटा और गूगल जैसे प्लेटफॉर्म पर होने वाले खर्च की रिपोर्टिंग के लिए कोई स्टैंडर्डाइज्ड सिस्टम नहीं है। वहीँ थर्ड-पार्टी पेजेज़ के संबंध में यह समस्या और भी विकत हो जाती है। नतीजा यह होता है कि इस तरह का व्यय अक्सर आधिकारिक खुलासों से बाहर होता है। या कह सकते हैं किडिजिटल प्रचार के वास्तविक खर्च की राशि रिपोर्ट की गई राशि से कहीं अधिक हो जाती है। ऐसे में कह सकते हैं कि चुनाव प्रचार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाने के बावजूद सोशल मीडिया पर किए जाने वले डिजिटल खर्च पर पूरी तरह नज़र रखना आसान नहीं है।
मीडिया रिपोर्ट्स से पता चलता है कि गूगल के एड्स ट्रांसपेरेंसी सेंटर और मेटा के एड लाइब्रेरी डेटा के मुताबिक़, भाजपा द्वारा किया जाने वाला खर्च सबसे अधिक है। डेटा के अनुसार, भाजपा ने 25 जनवरी से 24 अप्रैल के दौरान इन चार राज्यों में डिजिटल विज्ञापनों पर 40 करोड़ रुपये से अधिक का खर्च किया है। इन चुनावों में पार्टी ने करीब 50 हजार विज्ञापन चलाए, जिनमें सबसे अधिक पश्चिम बंगाल जबकि उसके बाद असम रहा।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की बात करें तो इस पार्टी का डिजिटल विज्ञापन खर्च 5 करोड़ से कम रहा। इस दौरान केरलम और असम में कांग्रेस की मौजूदगी मेटा पर दिखी। गूगल पर पार्टी का खर्च बहुत कम रहा। वहीँ पार्टी की तरफ से पश्चिम बंगाल के लिए कोई विज्ञापन नहीं चलाया गया।
तृणमूल कांग्रेस ने इस विधानसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में करीब 1.8 करोड़ रुपये मेटा पर खर्च किए, गूगल पर पार्टी की कोई खास मौजूदगी नहीं नज़र आई। वहीँ तमिलनाडु में डीएमके और एआईएडीएमके द्वारा खर्च की गई राशि करीब 0.9 करोड़ और 0.7 करोड़ रही और यह व्यय मेटा पर किया गया। वहीँ गूगल पर इनकी मौजूदगी लगभग न के बराबर पाई गई।