इस वर्ष यूएन महासभा की आधिकारिक बैठक में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल को, मुख्य विषय बनाया गया है। आज होने वाली इस बैठक में विश्व नेताओं से ऐसे सिद्धान्तों पर सहमति की उम्मीद है, जो पीड़ितों की मदद के लिए वैश्विक कार्रवाई को बढ़ावा देंगे।

विश्व स्वास्थ्य संगठन में ग़ैर-संक्रामक रोग और मानसिक स्वास्थ्य की कार्यवाहक निदेशक डॉक्टर देवोरा केस्टेल का कहना है- “पहली बार हमें यह बताने का मौक़ा मिल रहा है कि एक अरब से ज़्यादा लोग मानसिक स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे हैं। अवसाद सबसे आम समस्या है, उससे पीड़ित केवल नौ प्रतिशत लोगों को ही सहायता मिलती है।”
उन्होंने कहा कि नेताओं द्वारा ठोस कार्रवाई करने का उचित समय यही है। ठोस प्रतिबद्धता की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए उन्होंने यह भी कहा कि हमने पिछले कुछ वर्षों में मानसिक स्वास्थ्य की अहमियत पर खूब बातें सुनी हैं।
हालाँकि मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा पहले भी उठ है, लेकिन इस बार इसे शीर्ष प्राथमिकता दी जाएगी। इसके अलावा बैठक में हृदय रोग, कैंसर, मधुमेह और श्वसन रोग जैसे ग़ैर-संक्रामक रोगों (NCDs) की रोकथाम और नियंत्रण पर भी चर्चा होगी।
मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बीमारियाँ अब भी दुनिया में मौत और विकलांगता की सबसे बड़ी वजह हैं। चूँकि बहुत से लोगों में मानसिक एवं शारीरिक समस्याएँ साथ-साथ होती हैं, इसलिए देखभाल के लिए एकीकृत दृष्टिकोण बेहद ज़रूरी है। जहाँ सेवाएँ मौजूद भी हैं, वहाँ अक्सर लागत, दूरी या अन्य स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ाव की कमी के कारण वे पहुँच से बाहर रहती हैं।
डॉक्टर देवोरा केस्टेल आगे कहती हैं- “जबकि मनोविकृति (Psychosis) से पीड़ितों में से केवल 40 प्रतिशत को ही मदद मिल पाती है। इससे स्पष्ट है कि देशों को और बेहतर सेवाएँ विकसित करनी होंगी, ताकि देखभाल आसानी से उपलब्ध हो सके।”
बैठक में अपनाए जाने वाले राजनैतिक घोषणा-पत्र का मक़सद, ज्ञान साझा करने और वित्त पोषण बढ़ाने को प्रोत्साहित करना है।
डॉक्टर देवोरा केस्टेल ने आगे बताया कि सदस्य देशों ने ऐसे मुद्दों पर ज़ोर देने का फ़ैसला किया है जो सभी ग़ैर-संक्रामक रोगों से जुड़े हैं, और कुछ ऐसे भी जो विशेष रूप से मानसिक स्वास्थ्य से सम्बन्धित हैं- जैसे कि बच्चों व युवाओं का मानसिक स्वास्थ्य, आत्महत्या रोकथाम और समुदाय स्तर पर सेवाओं का विकास। डॉक्टर देवोरा केस्टेल के अनुसार मानसिक और शारीरिक बीमारियों के जोखिम कारक काफ़ी हद तक एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
वहीँ ग़ैर-संक्रामक रोगों (NCDs) के बढ़ने के बड़े कारणों में तम्बाकू और शराब का सेवन, शारीरिक गतिविधि की कमी, हानिकारक आहार और वायु प्रदूषण. साथ ही, समय पर जाँच, इलाज और देखभाल सेवाओं की कमी के चलते इनका प्रसार होता है।
डॉक्टर देवोरा केस्टेल ने नेताओं को भी सम्बोधित किया और कहा कि उनको समझना होगा कि ऐसे उपाय और तंत्र मौजूद हैं जिनसे मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक सबकी पहुँच सुनिश्चित की जा सकती है।
उन्होंने यह भी माना कि यह घोषणापत्र कोई “जादुई दस्तावेज़” नहीं होगा, लेकिन यह एक नई राह दिखा सकता है, देशों को एकजुट कर सकता है और साबित कर सकता है कि सुलभ एवं न्यायपूर्ण मानसिक स्वास्थ्य देखभाल, दुनिया के हर कोने में सम्भव है।
घोषणा-पत्र में प्रस्तावित होंने वाले बिंदु
प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल: सर्वजन के लिए रोकथाम, जाँच और उपचार जैसी बुनियादी सेवाओं तक पहुँच सुनिश्चित करना।
आवश्यक दवाएँ और स्वास्थ्य तकनीकें: यह गारंटी देना कि वे सुरक्षित, प्रभावी और उच्च गुणवत्ता वाली हों।
टिकाऊ वित्तपोषण: ख़ासतौर पर निम्न व मध्यम आय वाले देशों के लिए।
ग़ैर-संक्रामक रोगों (NCDs) व मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं में कई समान ख़तरे और इलाज की ज़रूरतें होती हैं। इन्हें स्वीकार करना और इनसे प्रभावित लोगों की आवाज़ को और मज़बूत बनाना ज़रूरी है।
अन्तर-क्षेत्रीय सहयोग: स्वास्थ्य केवल दवाओं पर नहीं, बल्कि पोषण, पर्यावरण, क़ानून और अर्थव्यवस्था पर भी निर्भर करता है।
बाहरी कारणों पर क़ाबू: जैसेकि वायु प्रदूषण, अस्वस्थ भोजन का प्रचार, तम्बाकू सेवन का प्रसार और प्रतिकूल सामाजिक व आर्थिक हालात।
वैश्विक जागरूकता बढ़ाना।










