पिघलते ग्लेशियर एक उभरता हुआ जानलेवा खतरा बनता जा रहा है

दुनिया भर में ग्लेशियर झीलों के टूटने से आई बाढ़ अब तक 13,000 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। यहाँ सबसे अधिक तबाई हिमालयी क्षेत्र और दक्षिण अमरीका के ट्रॉपिकल एंडीज में पाई गई है। जाँच से पता चलता है कि पहाड़ी ढलानें, नदियां और मानव बस्तियां सीधे इस खतरे की सीमा में हैं।

पिघलते ग्लेशियर एक उभरता हुआ जानलेवा खतरा बनता जा रहा है

वैश्विक आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि पिछले 120 वर्षों में ग्लेशियर झीलों के टूटने से आई बाढ़ की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। इसके चलते दुनिया भर में अब तक 13 हज़ार से अधिक जिंदगियां ख़त्म हो चुकी हैं। जानकारों का कहना है कि हिमालय की ऊंची चोटियों पर जमी बर्फ अब सिर्फ जलवायु परिवर्तन का संकेत नहीं, बल्कि उनके मुताबिक़ यह एक उभरता हुआ जानलेवा खतरा बनता जा रहा है।

अध्ययन बताते हैं कि बढ़ता हुआ ग्लोबल तापमान और ग्लेशियर झीलों के टूटने के बीच सीधा संबंध है। साल 1981 से 1990 के बीच दुनिया भर में हर साल औसतन पांच ऐसी बाढ़ की घटनाएं होती थीं, जबकि 2011 से 2020 के बीच यह आंकड़ा बढ़कर 15 प्रति वर्ष हो गया।

याद करें तो अक्टूबर 2023 में सिक्किम की तीस्ता घाटी में आने वाली विनाशकारी बाढ़ से 55 लोगों की जान गई थी और इस आपदा में 1,200 मेगावाट क्षमता का हाइड्रोपावर डैम पूरी तरह बह गया। यह घटना ऐसे खतरे की ताजा और भयावह मिसाल है जो सवाल उठाती है कि क्या भविष्य में ऐसी त्रासदियां अपवाद नहीं, बल्कि सामान्य हो जाएंगी।

जानकारों के मुताबिक़, यह बाढ़ दक्षिण ल्होनक झील के टूटने से आई थी और वैज्ञानिक भाषा में इसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) कहा जाता है। यह घटना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि हिमालय की शांत दिखने वाली बर्फ के नीचे एक गहरा और खामोश खतरा लगातार बढ़ रहा है।

इसी के तहत अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की एक टीम ने 120 वर्षों के आंकड़ों का विस्तृत विश्लेषण किया। सैटेलाइट चित्रों और ऐतिहासिक रिकॉर्ड के आधार पर वैज्ञानिकों ने दुनिया भर में जीएलओएफ की 609 घटनाओं की पहचान की है। यह संख्या पहले के वैश्विक रिकॉर्ड से कहीं अधिक है, जहां 1900 से 2020 के बीच सिर्फ 400 घटनाएं दर्ज थीं।

पड़ताल से पता चलता है कि इनमें सबसे ज्यादा घटनाएं हिमालय और ट्रॉपिकल एंडीज क्षेत्रों में हुई हैं, जहां मानव आबादी और बुनियादी ढांचे पर असर सबसे गंभीर रहा है।घटनाओं से जुड़ी तबाही पर विशेषज्ञों का कहना है कि वास्तविक आंकड़ा इससे भी अधिक हो सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि कई दूरदराज़ इलाकों में सभी घटनाओं की सही रिपोर्टिंग नहीं हो पाती।

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