लखनऊ मेडिकल से मजारों को हटानेके मामले में केजीएमयू प्रशासन ने अपनी सफाई जारी की है। प्रवक्ता डॉक्टर के के सिंह का कहना है कि शाहमीना शाह की मजार को कोई नोटिस नहीं दी गई है।

मेडिकल कॉलेज परिसर में बनी मजारों को हटाने के नोटिस का मामला इस समय चर्चा में है। इस दौरान केजीएमयू प्रशासन ने 5 मजारों को नोटिस भेजकर 15 दिन में जवाब मांगा है। दूसरी तरफ मजारों को नोटिस भेजने के बाद सियासत गर्म हो गई है। इस मामले में समाजवादी पार्टी सहित मुस्लिम धर्मगुरुओं ने नाराजगी व्यक्त की है।
मजारों को नोटिस भेजने को लेकर केजीएमयू प्रशासन ने अपनी सफाई जारी कर दी है। अस्पताल प्रशासन का कहना है कि शाहमीना शाह की मजार को कोई नोटिस नहीं भेजा गया है। इन सबके बीच केजीएमयू का नाम बदलने की भी मांग उठने लगी है।
केजीएमयू प्रवक्ता डॉक्टर के के सिंह अनुसार, सिर्फ 4-5 मजारों को नोटिस दिया गया है। ये मज़ारें पिछले 40 से 50 सालों में बनी हैं। अपनी सफाई में उन्होंने कहा कि केजीएमयू ने शाहमीना शाह की मजार और हाजी हरमैन दरगाह कोई नोटिस नहीं दिया गया है। आगे उन्होंने बताया कि ये मजारे जब बनी थी तब वो बहुत छोटी थीं। लेकिन बाद में उनका दायरा बढ़ता चला गया। इसका सर्वे केजीएमयू ने कराया था। ये कार्रवाई लंबे समय से चल रही थी।
प्रवक्ता ने आगे यह भी कहा कि अभी सिर्फ नोटिस दिया है। जिसपर उन्हें 15 दिन में अपना जवाब देना है। आगे की कार्रवाई जवाब के बाद कानूनी सलाह पर नियमानुसार की जाएगी।
केजीएमयू का नाम बदलने के सवाल पर प्रवक्ता का कहना है कि ये हमारा विषय नहीं है। केजीएमयू एक स्टेट यूनिवर्सिटी है। जिसके चलते केजीएमयू का नाम बदलने का ज़िम्मा सरकार और विधानसभा द्वारा लिया जाता है।
याद दिला दें कि इससे पहले भी दो बार अस्पताल का नाम बदलकर छत्रपति शाहू जी महाराज यूनिवर्सिटी रखा जा चुका है। आगे उन्होंने कहा कि केजीएमयू का नाम बदलने से भी उसकी संपत्तियां वही रहेगी। इससे संपत्तियों के नेचर और मालिकाना हक में कोई बदलाव नहीं होगा।
बताते चलें कि केजीएमयू स्थित मस्जिद शाहमीना शाह का निर्माण 655 साल पहले हुआ था। इसकी तामीर में मुग़ल कारीगरी की झलक मिलती है। जानकारी के मुताबिक, यह मजार लखनऊ की उन मस्जिदों में आती है, जिसे नवाबी काल से भी पहले बनवाया गया था। आस्था रखने वाले यहाँ बड़ी संख्या में आकर मुरादें मांगते हैं।














