पेरिस समझौते के लक्ष्य को हासिल करना अभी भी मुमकिन- यूएन महासचिव

वैश्विक जलवायु स्थिति की नवीनतम रिपोर्ट से पता चलता है कि बीता वर्ष यानी कि 2024, अबसे 175 वर्ष पहले रिकॉर्ड आरम्भ होने के बाद का सबसे अधिक गर्म साल रहा है। इस वर्ष तापमान, पूर्व-औद्योगिक स्तर से 1.55 डिग्री सेल्सियस ऊपर रहा।

पेरिस समझौते के लक्ष्य को हासिल करना अभी भी मुमकिन-यूएन महासचिव

इन ख़तरनाक प्रवृत्तियों के बावजूद, संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश का कहना है कि पेरिस समझौते के लक्ष्य को हासिल करना अभी भी सम्भव है। उन्होंने विश्व नेताओं से तेज़ी से बढ़ते इस संकट से निपटने के लिए कार्रवाई बढ़ाने का आहवान किया।

विश्व मौसम संगठन (WMO) की ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि 2024 में मानव-जनित जलवायु परिवर्तन का प्रभाव इतने ख़तरनाक स्तर तक पहुँच गया, जिसके कुछ परिणाम कई सदियों तक उलटने सम्भव नहीं होंगे।

उन्होंने आग्रह किया- “हमारा ग्रह अधिक संकटों का संकेत दे रहा है। लेकिन यह रिपोर्ट दर्शाती है कि दीर्घकालिक वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करना अभी भी मुमकिन है। विश्व नेताओं को इसे साकार करने के लिए तत्काल क़दम उठाना चाहिए और इस वर्ष नवीन राष्ट्रीय जलवायु योजनाएँ आरम्भ करके, अपने देशवासियों और अर्थव्यवस्थाओं के लिए किफ़ायती, स्वच्छ नवीकरणीय ऊर्जा के लाभ प्राप्त करना चाहिए।”

ऐसा पहली बार हुआ है जब तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस की गम्भीर चेतावनी को पार कर गया है। हालाँकि किसी एक वर्ष में तापमान के 1.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जाने का कतई यह मतलब नहीं हैं कि पेरिस समझौते के दीर्घकालिक लक्ष्य (1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे का दीर्घकालिक औसत) हासिल नहीं हो सकेगा। मगर यह एक स्पष्ट चेतावनी ज़रूर देता है कि तत्काल उत्सर्जन घटाना बहुत आवश्यक हो गया है।

इन सबके बीच अन्य कई जलवायु संकेतक भी नए रिकॉर्ड स्थापित कर रहे हैं। वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड सांद्रता, 800,000 वर्षों के अपने उच्चतम स्तर पर है, और महासागरों में अभूतपूर्व स्तर पर तापमान वृद्धि देखी जा रही है.

ग्लेशियर और समुद्री बर्फ़ तेज़ी से पिघल रहे हैं, जिससे वैश्विक समुद्री स्तर में वृद्धि हो रही है, और दुनिया भर में तटीय पारिस्थितिकी तंत्र एवं बुनियादी ढाँचा ख़तरे में है।

साथ ही, पिछले साल उष्णकटिबंधीय चक्रवातों, बाढ़, सूखे व अन्य ख़तरों के कारण, 16 वर्षों के भीतर सबसे अधिक नए विस्थापन दर्ज किए गए, जिससे खाद्य संकट और भी बदतर हो गया तथा बड़े पैमाने पर आर्थिक नुक़सान हुआ।

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