20 जुलाई का दिन अंतर्राष्ट्रीय शतरंज दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह एक खेल ही नहीं बौद्धिक, सांस्कृतिक और सामाजिक परिवर्तन के उपकरण के रूप में भी महत्वपूर्ण टूल है।

अंतर्राष्ट्रीय शतरंज दिवस 2025 की थीम है- ‘हर चाल मायने रखती है’ (Every Move Counts) रखा गया है। जो हमें यह याद दिलाता है कि जीवन और खेल दोनों ही मैदान में लिया जाने वाला निर्णय हमारे भविष्य को आकार देता है।
आज का यह दिन साल 1924 में पेरिस में अंतरराष्ट्रीय शतरंज महासंघ (FIDE) की स्थापना की याद दिलाता है। महासंघ के अध्यक्ष अर्कादी द्वोर्कोविच ने बुडापेस्ट में हुई महासभा में यह घोषणा की कि 2025 को “सामाजिक शतरंज का वर्ष” के रूप में मनाया जाएगा। संयुक्त राष्ट्र ने 12 दिसंबर 2019 को 20 जुलाई को “विश्व शतरंज दिवस” घोषित किया था, जिसे 1966 से FIDE के पहल पर मनाया जाता आ रहा है।
क्यूंकि शतरंज के माध्यम से आत्म-विकास, अनुशासन, तर्कशक्ति और सामुदायिक जुड़ाव को बढ़ावा देने में सहायता मिलती है। यही कारण है कि इस दिन को मानाए जाने का मक़सद शतरंज खेले जाने की कला को समाज के उन वर्गों तक पहुंचाना है जो अक्सर हाशिए पर होते हैं। इनमे कैदी, वंचित बच्चे और युवा वर्ग को महत्व दिया गया है।
13वीं सदी की ‘लिब्रो दे लॉस जुएगोस’ (Libro de los Juegos) नामक किताब में इसके नियम आधुनिक शतरंज जैसे ही हैं। शतरंज के इतिहास की बात करें तो माना जाता है कि शतरंज की शुरुआत भारत में गुप्त काल (319–543 ई.) में हुई। उस समय इसे ‘चतुरंग’ कहा जाता था। इसमें चार प्रकार की सेना होती थी जिसमे पैदल, घुड़सवार, रथ और हाथी थे जिन्हे आज की मोहरों जैसे प्यादे, घोड़े, हाथी और ऊंट के रूप में पहचान मिली है।
अपने विकास के अगले चरण में यह खेल फारस पहुंचा। जहां इसे ‘चत्रंग’ नाम मिला और इसके बाद यह ‘शतरंज’ कहलाया। अरबों सहित यूरोपीय देशों में इसे खूब विस्तार मिला और इस शोहरत ने इसे एक वैश्विक खेल बना दिया।
इस वर्ष की थीम- ‘हर चाल मायने रखती है’ महज़ एक थीम नहीं, बल्कि एक जीवन दर्शन है। यह खेल सबक़ देता है कि सोच-समझकर उठाया गया हर कदम भविष्य को आकार देता है। यह बात खेल के साथ जीवन पर भी लागू होती है।
