झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन का निधन हो गया। उनकी तबीयत लंबे समय से खराब चल रही थी और वे कई दिनों से वेंटिलेटर सपोर्ट पर थे। किडनी से जुड़ी गंभीर समस्याओं के चलते उन्हें दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

उनके निधन की खबर मिलते ही राज्यभर में शोक की लहर है। ‘दिशोम गुरु’ के नाम से लोकप्रिय शिबू सोरेन ने झारखंड की राजनीति में एक लंबी और मज़बूत पारी संभाली है। एक मजबूत सियासी स्तंभ के रूप में उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के बैनर तले अपनी लड़ाई लड़ी। इस लड़ाई में उन्होंने आदिवासियों के अधिकारों के लिए कड़ा संघर्ष किया।
शिबू सोरेन के पुत्र और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने सोशल मीडिया पर एक भावुक पोस्ट साझा की है जिसमे उन्होंने लिखा- “आदरणीय दिशोम गुरुजी हम सभी को छोड़कर चले गए हैं। आज मैं शून्य हो गया हूं…”
सर गंगा राम अस्पताल की ओर से जारी बुलेटिन के अनुसार, सुबह 8:56 बजे शिबू सोरेन का निधन हो गया। अस्पताल ने बताया कि लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया। वे किडनी की बीमारी से पीड़ित थे और डेढ़ महीने पहले उन्हें स्ट्रोक भी हुआ था। पिछले एक महीने से वे लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर थे।
शिबू सोरेन को झारखंड में ‘गुरुजी’ के नाम से जाना जाता था। वे झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक नेताओं में से एक थे। शिबू सोरेन ने बिहार से अलग राज्य ‘झारखंड’ बनाने के आंदोलन में निर्णायक भूमिका निभाई। वे तीन बार (2005, 2008, 2009) झारखंड के मुख्यमंत्री बने मगर इत्तिफाक से एक बार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। उनके प्रयासों और लंबे संघर्ष के परिणामस्वरूप 15 नवंबर 2000 को झारखंड राज्य का गठन हुआ।
शिबू सोरेन झारखंड राज्य के तीन बार मुख्यमंत्री बने और केंद्र में कोयला मंत्री के रूप में भी उन्होंने अपनी ज़िम्मेदारी संभाली। उनका जन्म बिहार के हजारीबाग में 11 जनवरी 1944 को हुआ था। उन्हें दिशोम गुरु और गुरुजी के नाम से जाना गया। उनकी राजनीतिक यात्रा में कई उतार-चढ़ाव भी आए। भ्रष्टाचार और हत्या जैसे गंभीर मामलों में वे आरोपित हुए, हालांकि बाद में कई मामलों में बरी भी हुए।
अपनी सियासत की पारी में उन्होंने आदिवासियों के शोषण के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी। उन्होंने पहली बार 1977 में चुनाव लड़ा मगर इसमें उन्हें हार का सामना करना पड़ा। हालांकि 1980 में वह फिर चुनावी मैदान में उतरे और लगातार कई बार सांसद चुने गए।
उनके निधन की खबर मिलते ही शोक का मूल है। विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक संगठनों द्वारा उन्हें श्रद्धांजलि देने का सिलसिला जारी है। उनके जाने को झारखंड की राजनीति के एक युग का अंत कहा जा रहा है। और यह भी कहा जा रहा है कि उनके योगदान को आने वाली पीढ़ियां हमेशा याद रखेंगी।
