उसूल कहता है कि मूवी देखकर समीक्षा लिखी जाए मगर हालात यह हैं कि मूवी देखने वालों को देखकर समीक्षा लिखने का दिल कर रहा है। अब उसूल बदला है तो इतना किया जा सकता है कि नाम भी बदल दें। नया नाम ‘मैं सियापा फैलाऊंगा’ मुनासिब लग रहा है।
खैर! बचपन में अपने बुज़ुर्गों को अकसर यह कहते सुना है, ‘हम लोग तो अब मिस्ल चिराग़-ए-सहर हैं।’ इसका मतलब होता है रात भर का जला हुआ वह चिराग़ जो बुझने के करीब है। और इसी चिराग़-ए-सहर को इम्तियाज़ अली साहब ने बंटवारे से जोड़ते हुए ऐसा इमोशनली कैश किया है कि देखने वाले इस दुख की ताब नहीं ला पा रहे हैं।
ट्रेलर नुमा लिफाफा देखकर अंदर के जिस मज़मून का अंदाजा लगाया है, उससे इतना ही समझ आया कि माजरा यह है कि सन सैतालीस में जो सोलह बरस का था वह इस वक़्त पंचाननबे बरस का होगा। बस यही इस फिल्म का फार्मूला है कि सोलह की उम्र और बंटवारे की ट्रैजिडी। बाक़ी लंतरानी आप सबके सामने है। या थोड़ा भद्दा जुमला कहें तो यह कि इम्तियाज़ अली साहब थोड़ा और लेट हो जाते तो मोहब्बत की यह स्टैण्डर्ड उम्र उनके हाथ से निकल जाती। कुछ बरस पहले बनाते तो पंचाननबे की उम्र यानी मिस्ल चराग़ ए सहर की बेचारगी की नुमाइश इतनी आला न होती और कुछ बरस बाद बनाने में यह सवाल उठता कि उस ज़माने के लव बर्ड्स अब कहां ज़िंदा होंगे? और कहानी का जो मज़ा खुद किरदार के ज़रिए आता उसे किसी से कहलवाने में इमोशन ज़रा सेकेंड हैंड हो जाते इसलिए सटीक शगुन यही था।
कहानी में ईश्वर सिंह ग्रेवाल (नसरूद्दीन शाह) अगर अल्ज़ाइमर और डिमेंशिया की गिरफ्त में न आते तो शायद ही कोई जान पाता कि हिजरत का दर्द झेलने वाले यह वह लोग थे जिन्होंने अपनी जड़ों को खोया मगर अपने आपको खोखला होने से बचा लिया। बंटवारे के इस खूनी खेल में लाहौर और पंजाब के बाशिंदों ने सबसे ज़्यादा तकलीफें उठाई हैं जबकि इन दुखों की सबसे ज़्यादा ठेकेदारी हिन्दू और मुस्लमान के हिस्से रही। अपने दुखों को दरकिनार करते हुए या दिल की बिलकुल निचली तहों में दफन करने के बाद उस मुल्क को अपना माना जहां हिजरत कर के पहुंचे। फिर हर ग़म को तब तक छुपाकर रखा जब तक इस बीमारी के हाथों मजबूर न हो गए। दुख तो बेशुमार रहे होंगे। अब क्यूंकि लव स्टोरी सदाबहार फार्मूला होती है, तो किसी और तरफ जाने की ज़रूरत ही नहीं।
इंडस्ट्री आज भी मोहब्बत की थीम से बाहर नहीं निकल पा रहे जबकि मंटो बंटवारे के बाद ही ‘टोबा टेक सिंह’ से ऐसा रूबरू करा गए थे कि उनकी कहानी की कोई काट आजतक नज़र न आई। जिस अल्ज़ाइमर और डिमेंशिया की बदौलत यह कहानी पेश की गई है, बेहतर होगा कि एक बार उससे जुड़े आंकड़े भी देख लिए जाएं। भारत और एशिया के नहीं यूरोप और अमरीका के भी। इससे जूझते मरीज़ों को देखिए, उनके साथ रहने वालों को देखिए और अभी तक इसके लिए बेहतर दवा की तलाश में जुटे शोधकर्ताओं को देखिए।
अगर आपके शहर में जेरियटिक्स (geriatrics) सेंटर हैं तो खुद को खुशकिस्मत समझिए क्यूंकि फ्रंटलाइन डॉट द हिंदू डॉट कॉम की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में पंद्रह करोड़ बुज़ुर्गों के लिए सिर्फ़ 300-350 जेरियाट्रिशियन यानी बुज़ुर्गों के डॉक्टर हैं। मेंडिकल के मात्र नौ कॉलेजों में जेरियाट्रिक मेडिसिन में एमडी की सिर्फ़ 31 सीटें ऑफ़र करते हैं। रिपोर्ट यह भी कहती है कि आने वाले कुछ दशकों में भारत को हज़ारों ऐसे विशेषज्ञों की ज़रूरत होगी जो बुज़ुर्गों को पुरानी बीमारियों, डिमेंशिया और उम्र बढ़ने के साथ होने वाली शारीरिक अक्षमताओं से निपटने में मदद कर सकें। फिलहाल तो यहां सारा दारोमदार उस परिवार का है जिन का मरीज़ इस परेशानी को झेल रहा है।
वैसे भी हमारी सरकारें अब जिस्म को मज़बूत बनाने के लिए योग पर योग करवा रही हैं। मज़बूत जिस्म के साथ अगर जज़्बात कमज़ोर रह जाएं तो बुरा नहीं मगर एक तरफ़ा कमज़ोरी भी ठीक नहीं। यह तो ज़्यादती होगी कि ‘सय्यारा’ और ‘मैं वापस आऊंगा’ देखकर रोया जाए और जिन मुद्दों पर वाक़ई रोना चाहिए उनसे नज़रें फेर ली जाएं। हालांकि मज़हबी मज़बूती के लिए भी आए दिन कोई न कोई ‘फाइल्स’ टाइप मूवी बन रही है मगर यहां हर क़ौम में ऐसे लोगों की भी भरमार है जिनका मज़हब बात-बात पर आहत हो जाता है। अच्छा होगा कि इस मज़बूती की तरफ भी फिल्मसाज़ कुछ ध्यान दें।