जीवन रक्षा एवं भविष्य में होने वाले प्रकोपों के विनाशकारी परिणामों से बचने के लिए एक प्रथम ऐतिहासिक अन्तरराष्ट्रीय समझौता किया गया है। इसे मज़बूत वैश्विक सहयोग सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा क़दम माना जा रहा है।

कोई नहीं भूला है कि कोविड महामारी के प्रभाव से लगभग 70 लाख लोगों की मौत हुई, स्वास्थ्य प्रणालियाँ चरमरा गईं और वैश्विक अर्थव्यवस्था असल में से पूरी तरह ठप होने के निकट पहुँच गई थी।
अन्तरराष्ट्रीय समुदाय को इस वैश्विक उथल-पुथल सचेत रहने और ऐसी घटनाओं को रोकने के उद्देश्य से, एक समझौते पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। इसमें यह सुनिश्चित किया गया कि दुनिया भविष्य में इस तरह की महामारियों का मुक़ाबला करने के लिए बेहतर तरीक़े से तैयारी की जाए।
पिछले सप्ताह जेनेवा में विश्व स्वास्थ्य सभा की बैठक में यह निर्णय लिया गया, जोकि विश्व स्वास्थ्य संगठन की वार्षिक बैठक होती है।
इस समझौते को औपचारिक रूप से मंगलवार को अपनाया गया, मगर डब्ल्यूएचओ के सदस्य देशों ने सोमवार को ही इस समझौते को भारी बहुमत से मंज़ूरी दे दी।
यह समझौता सर्वसम्मति से पारित हुआ। इसके पक्ष में 124 वोट पड़े और 11 सदस्य देश अनुपस्थित रहे। इसके विरोध में कोई मत नहीं पड़ा। मतदान से 11 देश अनुपस्थित रहे जबकि अमरीका बाहर रहा। इस समझौते पर हुए मतदान में, पोलैंड, इसराइल, इटली, रूस, स्लोवाकिया और ईरान सहित 11 देश अनुपस्थित रहे। अनुपस्थित रहने वाले देशों को, मतदान के बाद यह बताने का अवसर दिया गया कि उन्होंने यह फ़ैसला क्यों लिया।
मतदान से पहले आयोजित हुए उच्चस्तरीय चरण में, एक प्रमुख आपत्ति संयुक्त राज्य अमरीका की तरफ़ से दाख़िल की गई, जिसने जनवरी (2025) में WHO से बाहर होने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी, जिसके लागू होने में एक वर्ष का समय लगता है।
स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक डॉक्टर टैड्रॉस ने कहा- “यह समझौता सार्वजनिक स्वास्थ्य, विज्ञान और बहुपक्षीय कार्रवाई की जीत है। यह सुनिश्चित करेगा कि हम सामूहिक रूप से भविष्य की महामारी के ख़तरों से दुनिया की बेहतर तरीक़े से रक्षा कर सकें।”
आगे उन्होंने कहा कि अन्तरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा भी एक मान्यता है कि हमारे नागरिकों, समाजों और अर्थव्यवस्थाओं को, कोविड-19 के दौरान झेले गए नुक़सानों की तरह, फिर से असुरक्षित नहीं छोड़ा जा सकता।













