धरती पर होने वाली घटनाओं का हज़ारों किलोमीटर दूर के क्षेत्रों को प्रभावित करना क्लाइमेट टेलिकनेक्शन है। वैज्ञानिक मानते हैं कि इन घटनाओं में अब वृद्धि होने लगी है।
धरती के किसी एक कोने में होने वाला जलयायु परिवर्तन कहीं सुदूर की जलवायु को प्रभावित करता है। केओस इंटरडिसिप्लिनेरी जर्नल ऑफ नॉन लीनियर साइंस में प्रकाशित एक शोधपत्र में यह बात सामने आयी है।
क्लाइमेट टेलीकनेक्शन स्पष्ट करते हैं कि किस प्रकार से दुनिया के किसी हिस्से में लगी जंगल की आग कहीं सुदूर की जलवायु को प्रभावित करती है और परिणामस्वरूप बाढ़ जैसी घटना सामने आती है।
अध्ययन से पता चलता है कि पिछले 37 वर्षों में टेलीकनेक्शन की तीव्रता लगातार बढ़ी है। वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन, मानवीय गतिविधियों तथा अन्य कारकों को इसका कारण बता रहे हैं। ये टेलिकनेक्शन वायुमंडल और महासागर दोनों में पाया जाता हैं।
प्रकाशित रिसर्च से पता चला है कि इन टेलीकनेक्शन के चलते बीते 37 वर्षों में दक्षिणी गोलार्ध अधिक प्रभावित हुआ है।विश्लेषण से ये खुलासा भी हुआ कि टेलीकनेक्शन के लिए सबसे अधिक असुरक्षित क्षेत्र दक्षिणपूर्वी ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका में थे।
दक्षिणी गोलार्ध को अधिक असुरक्षित इसलिए पाया गया क्योंकि इसका अधिकतर हिस्सा महासागरों से ढका हुआ है। ऐसे में यह अधिक स्थिर टेलीकनेक्शन और रॉस्बी तरंग अथवा ग्रहीय तरंग निर्माण में योगदान देता है।
शोधकर्ता इस बात का भी खुलासा करते हैं कि अगले पांच वर्षों में पृथ्वी का तापमान उस स्तर तक बढ़ सकता है, जिसकी वैज्ञानिक पहले भी चेतावनी देते रहे हैं।
रॉस्बी लहरें महासागरों और वायुमंडल में होती हैं और ये स्वाभाविक रूप से पृथ्वी के घूमने के कारण पैदा होती हैं। वैज्ञानिकों ने टेलीकनेक्शन की दिशाओं और वितरण पैटर्न को परखने के लिए वैश्विक दैनिक सतही वायु तापमान डेटा की सहायता ली। उन्नत डेटा प्रोसेसिंग और गणितीय एल्गोरिदम की मदद से टेलीकनेक्शन की तीव्रता और संवेदनशील क्षेत्रों को पहचानने में मदद मिली।
क्योंकि उत्तरी गोलार्ध में पर्यावरण प्रदूषण और मानवीय गतिविधियां इस क्षेत्र को काफी जटिल बनाती हैं। इसके नतीजे में इस भूभाग पर जंगल की आग जैसी घटनाएं सामने आती हैं।
इस घटनाओं के कारण रॉस्बी तरंगें अस्थिर हो जाती हैं। शोध से पता चलता है कि टेलीकनेक्शन में मुख्य रूप से वायुमंडलीय रॉस्बी तरंगों का प्रभुत्व होता है।
शोधकर्ता इस बात का भी खुलासा करते हैं कि अगले पांच वर्षों में पृथ्वी का तापमान उस स्तर तक बढ़ सकता है, जिसकी वैज्ञानिक पहले भी चेतावनी देते रहे हैं। रिसर्च टीम का अनुमान है कि इससे मिलने वाले निष्कर्ष मौसम की घटनाओं की भविष्यवाणी करने में सहायक होंगे।