सीईआरडी, 18 स्वतंत्र एक्सपर्ट्स की एक यूएन कमिटी है जो सभी तरह के नस्लीय भेदभाव को खत्म करने पर इंटरनेशनल कन्वेंशन को लागू करने पर नज़र रखती है। साल 2007 के बाद पहली बार, इस महीने कमिटी ने भारत का रिव्यू किया।
यूनाइटेड नेशंस ने भारत में लॉ एनफोर्समेंट एजेंसियों द्वारा दलितों, आदिवासी समुदायों और एथनिक और धार्मिक माइनॉरिटीज़ की एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल किलिंग, टॉर्चर और बुरे बर्ताव पर चिंता जताई है। रिपोर्ट में खास तौर पर भारत के शेड्यूल्ड ट्राइब्स, शेड्यूल्ड कास्ट्स और दलित समुदायों का ज़िक्र है।
यूएन कमिटी ऑन द एलिमिनेशन ऑफ़ रेशियल डिस्क्रिमिनेशन (CERD) ने मंगलवार को जारी अपनी रिपोर्ट में कहा कि वह भारत में लॉ एनफोर्समेंट अधिकारियों द्वारा अलग-अलग एथनिक, धार्मिक और सोशल ग्रुप्स के खिलाफ़ बड़े पैमाने पर हिंसा को लेकर गंभीर रूप से चिंतित जताई है। कमिटी ने भारत सरकार से ऐसे सभी आरोपों की असरदार तरीके से जांच करने और ज़िम्मेदार लोगों को सज़ा दिलाने की अपील की।
बताते चलें कि सीईआरडी, 18 इंडिपेंडेंट एक्सपर्ट्स की एक यूएन कमिटी है जो सभी तरह के नस्लीय भेदभाव को खत्म करने पर इंटरनेशनल कन्वेंशन को लागू करने पर नज़र रखती है। साल 2007 के बाद पहली बार, इस महीने कमिटी ने भारत का रिव्यू किया।
दूसरी ओर, भारत ने अपने जवाब में देश के मल्टीकल्चरल और अलग-अलग तरह के समाज, संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा उपायों, और सभी नागरिकों के लिए बराबरी, सम्मान और मौके पक्का करने की कोशिशों को हाईलाइट किया है।
यूएन एक्सपर्ट्स के मुताबिक, पुलिस द्वारा रोके जाने और पहचान के कागज़ों की जांच के दौरान कथित तौर पर नस्लीय प्रोफाइलिंग की वजह से कुछ लोगों को बिना सही प्रोसेस के गिरफ्तार या हिरासत में लिया गया है, और टॉर्चर और बुरे बर्ताव की खबरें भी आई हैं।
कमिटी ने उन लोगों के डिपोर्टेशन या ज़बरदस्ती वापस भेजे जाने पर भी चिंता जताई, जिन्हें इंटरनेशनल सुरक्षा की ज़रूरत हो सकती है। इसने भारत से इन ग्रुप्स के खिलाफ भेदभाव, हेट स्पीच और हेट क्राइम को तुरंत सुलझाने और बड़े पैमाने पर डिपोर्टेशन से बचने की अपील की।
हालांकि सीईआरडी की सिफारिशों को लागू करना कानूनी तौर पर ज़रूरी नहीं है, लेकिन इनका ह्यूमन राइट्स के लिए किसी देश की इंटरनेशनल रेप्युटेशन पर बड़ा असर पड़ सकता है।
कमिटी ऑन द एलिमिनेशन ऑफ़ रेशियल डिस्क्रिमिनेशन (CERD) के अनुसार, इन उल्लंघनों में एथनिक-बेस्ड हिंसा, गैर-ज़रूरी और बहुत ज़्यादा बल का इस्तेमाल, एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल किलिंग, बिना सही प्रोसेस के लंबे समय तक हिरासत में रखना, टॉर्चर, बुरे बर्ताव और सेक्शुअल हिंसा के आरोप शामिल हैं।
रिपोर्ट में बंगाली बोलने वाले मुसलमानों, रोहिंग्या, माइग्रेंट्स और शरण चाहने वालों की स्थिति पर भी खास चिंता जताई गई है। कमिटी के मुताबिक, हाल के दिनों में इन ग्रुप्स के खिलाफ कानून लागू करने वाले अधिकारियों की संख्या बढ़ी है।