लगभग एक दशक पहले एशिया-प्रशान्त के देशों ने हर एक ज़िन्दगी की गिनती या रिकॉर्ड में उसकी मौजूदगी सुनिश्चित करने का एक अभियान शुरू किया था, इसके बावजूद आज भी पूरे क्षेत्र में करोड़ों लोग अदृश्य हैं। यह वह लोग हैं जिनके जन्म, जीवन और मृत्यु की कोई पहचान या रिकॉर्ड ही नहीं है। इसी वास्तविकता को बदलने के लिए एशिया और प्रशान्त क्षेत्र की सरकारों ने अब, 2030 तक हर जन्म का पंजीकरण और हर मृत्यु का रिकॉर्ड सुनिश्चित करने का संकल्प लिया है।

इस प्रयास को एक महत्वपूर्ण क़दम माना जा रहा है। दरअसल इसकी बदौलत नागरिक पंजीकरण और महत्वपूर्ण सांख्यिकी (CRVS) पर आयोजित तीसरे मंत्री स्तरीय सम्मेलन में लिया गया यह निर्णय सार्वभौमिक, समावेशी और सहनसक्षम CRVS प्रणाली को वास्तविकता में बदलने का काम करेगा। यह घोषणापत्र, 2030 तक के लिए एक स्पष्ट और महत्वाकांक्षी रोडमैप प्रस्तुत करता है, जिसमें लोगों को केन्द्र में रखा गया है।
मंत्री स्तरीय घोषणापत्र, उस साझा दृष्टिकोण की पुष्टि करता है जिसके तहत क्षेत्र के सभी लोगों को ऐसी CRVS प्रणाली का लाभ मिले जो क़ानूनी पहचान सुनिश्चित करे, मानवाधिकारों की रक्षा करे, सुशासन को सुदृढ़ बनाए, सार्वजनिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए तथा सतत विकास को गति दे। इसमें विवाह पंजीकरण के महत्व और भविष्य के संकटों से निपटने में सक्षम प्रणाली के निर्माण की आवश्यकता पर भी बल दिया गया है।
इस मुहिम का उद्देश्य शेष अन्तराल को समाप्त करना, सहनसक्षम एवं समावेशी CRVS प्रणाली का निर्माण करना और यह सुनिश्चित करना है कि हर व्यक्ति – चाहे उसका लिंग, स्थान या परिस्थिति कुछ भी हो – गिनती हो, वो संरक्षित हों और सार्वजनिक नीति में उनकी मौजूदगी दर्ज हो।
पिछले दशक में इस दिशा में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। साल 2012 में जहाँ पाँच वर्ष से कम उम्र के साढ़े 13 करोड़ बच्चों का जन्म के बाद पंजीकरण नहीं हो पाता था, अब ऐसे बच्चों की संख्या घटकर 5.1 करोड़ पर आ गई है। इसमें 60 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।
आज, 29 देश, एक वर्ष के भीतर 90 प्रतिशत से अधिक जन्मों का और 30 देश, इतनी ही संख्या में मृत्यु का पंजीकरण कर रहे हैं। मृत्यु के कारणों की जानकारी दर्ज करने की गुणवत्ता भी बेहतर हुई है।
इसके बावजूद चुनौतियाँ बरक़रार हैं। अनुमान है कि अब भी क्षेत्र में लगभग 1.4 करोड़ बच्चों का जन्म एक साल तक भी पंजीकृत नहीं होता। और हर साल लगभग 69 लाख मौतें बिना रिकॉर्ड के रह जाती हैं, ख़ासतौर पर दूरदराज़ या स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित क्षेत्रों में।
संयुक्त राष्ट्र की अवर महासचिव और ESCAP की कार्यकारी सचिव, आर्मिडा सलसियाह अलिसजाहबना ने कहा, “ये आँकड़े केवल संख्याएँ नहीं, बल्कि उन ज़िन्दगियों के प्रतीक हैं जिन्हें क़ानूनी मान्यता नहीं मिली और जिन परिवारों को कोई समर्थन नहीं मिल सका। इस सप्ताह हुए विमर्श ने कार्रवाई के लिए एक सशक्त आहवान दिया है।”














