नोबेल पुरस्कार और भारत रत्न से सम्मानित अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने बंगाली भाषा और प्रवासी बंगाली मज़दूरों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार पर गहरी चिंता ज़ाहिर की है। भारत को एक अखंड राष्ट्र बताते उहे उन्होंने इसके हर नागरिक को देश के किसी भी हिस्से में समान अधिकार प्राप्त होने की बात कही। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी समुदाय को सताया जाना संविधान के विरुद्ध है और इसकी निंदा की जानी चाहिए।

ईटीवी भारत में प्रकाशित एक खबर के अनुसार, अमर्त्य सेन शांतिनिकेतन स्थित अपने घर ‘प्रतीची’ में मीडिया से मुखातिब थे। इस मौके पर कि जो भारतीय हैं, उनका पूरे देश पर अधिकार है। आगे उन्होंने कहा कि यह सिर्फ़ एक क्षेत्रीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अधिकार है।
अमर्त्य सेन ने किसी भी भाषा या समुदाय की उपेक्षा या उत्पीड़न को अस्वीकार्य बताया। उन्होंने भारतीय संविधान का उल्लेख करते हुए कहा कि यह अधिकार हमारे संविधान द्वारा सुनिश्चित किए गए हैं और इन्हें नज़रअंदाज़ करना लोकतांत्रिक मूल्यों का अपमान है।
दूसरे राज्यों में रह रहे बंगाली प्रवासी मज़दूरों पर होने वाले अत्याचारों पर अपनी बात में उन्होंने कहा कि यह सिर्फ बंगालियों की बात नहीं है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि यह देश के किसी भी हिस्से के नागरिकों के अधिकारों का सवाल है। आगे उन्होंने कहा कि कोई चाहे तो ओडिशा से राजस्थान जाए, या पंजाब से तमिलनाडु। हर किसी को समान सम्मान मिलना चाहिए। इसे प्रोफ़ेसर सेन ने भारत की एकता और विविधता के लिए अहम बताया।
अमर्त्य सेन ने अपनी बात में इस पर ज़ोर दिया कि भाषाओं का सम्मान किसी एक राज्य की नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की जिम्मेदारी है। बंगाली भाषा की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा- “बंगाली भाषा का उद्गम चर्यापद से हुआ है, यह रवींद्रनाथ टैगोर और काज़ी नज़रुल इस्लाम की भाषा है। इसकी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए।”
बोलपुर में बंगाली भाषा के समर्थन में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा निकाले गए मार्च को उन्होंने स्वागतयोग्य बताया और कहा साथ ही उन्होंने भाषा के संरक्षण को सांस्कृतिक विरासत की रक्षा से जोड़ा।














