या अब्बास की सदाओं के साथ निकला अलम फतह-ए-फुरात

लखनऊ। सोमवार को आठवीं मोहर्रम पर अलम फतह-ए-फुरात का जुलूस रवायती तरीके से पुरअश्क माहौल और या अब्बास की सदाओं के बीच निकला। आजादारों ने दर्द भरी सदाओं के साथ दरिया वाली मस्जिद से यह जुलूस निकाला। इसमें शामिल सोगवार इमाम हुसैन की फौज के सिपहसालार और उनके भाई हजरत अब्बास की वफादारी और बहादुरी का वर्णन किया। उनकी याद में नौहा पढ़े गए।  muharram lucknow

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अब्बास का परचम है अलम

दुनिया में जहां भी इमाम हुसैन के रौजे का प्रतीक ताजिया उठाया जाता है। वहां ताजिए के साथ अलम भी मौजूद रहता है। दरिया वाली मस्जिद से गुफरानमाब वाली मसजिद तक आठवीं मोहर्रम का अलम फतह-ए-फुरात का जुलूस निकाला। जुलूस में मौजूद अलम इमाम हुसैन की फौज के सिपहसालार हजरत अब्बास की याद में उठाया गया। मस्जिद में हज़ारों की संख्‍या में काला लिबास पहने शिया समुदाय के लोग पहुंचे। वे अलम को छूने और उसे चूमने की कोशिश कर रहे थे। साथ ही मन्‍नत मांग रहे थे। इस दौरान हर कोई गमजदा था, मानो हजरत अब्बास की याद में उनकी आंखों से अश्कों का समन्दर उबल आया हो।

जुलूस से पहले मजलिस का आयोजन किया गया। इसमें बताया गया कि कैसे हजरत अब्बास को इमाम हुसैन ने अपनी छोटी सी फौज का सिपहसालार बनाया था। वो कितने बहादुर और इमाम हुसैन से इजाजत लेकर कैसे कर्बला के मैदान में कुर्बानी देने आए थे। वे उस दरिया पर पानी लाने गये थे जिस पर यजीद की फौज का पहरा लगा था। जंग करते हुए वे दरिया तक पहुंचे और मश्क में पानी भरा। खैमों में वापस लौटते समय यजीदी फौज ने उन पर छिपकर हमला कर दिया। उनके दोनों हाथ काट दिए गए और उन्हें शहीद कर दिया गया। इंसानियत के लिए इमाम हुसैन के साथ उन्होंने भी शहादत दी जिसे याद कर अजादारों ने उन्हें पुरनम आंखों से याद किया।

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