हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ सूचना का आभाव शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य सहित कई बेहद अनिवार्य सुविधाओं से वंचित कर देता है। आज का समय सूचना का समय है। वर्तमान में मोबाइल और इंटरनेट की बदौलत जीवन के इतने काम हल हो रहे हैं कि यह रोटी कपड़ा और मकान की तरह एक बेसिक ज़रूरत बन चुका है।
अन्तरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ (ITU) के एक नए विश्लेषण से पता चलता है कि वर्ष 2025 में दुनिया की आबादी का 74 प्रतिशत यानी करीब 6.1 अरब लोग इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे थे। साल 2026 में यह आँकड़ा बढ़कर 6.3 अरब यानी 76 फ़ीसदी) तक पहुँच चुका है।
रिपोर्ट के निष्कर्ष और विसंगतिया
आईटीयू का यह अध्ययन जहाँ एक तरफ विश्व की तीन-चौथाई से अधिक आबादी द्वारा इंटरनेट के इस्तेमाल की जानकारी देता है वहीँ इसकी पड़ताल कुछ विसंगतियाँ भी सामने लाती है। यह ऐसी विसंगतिया हैं जो सूचना के प्रसार और लोगों के बीच एक बड़ी दरार दर्शाती है।
मोबाइल उपलब्धता
सबसे पहले आबादी के बीच मोबाईल की उपलब्धता से जुड़े आंकड़ों पर नज़र डालें तो पाते हैं कि दस वर्ष व उससे अधिक के आयु वर्ग में 84 प्रतिशत लोगों के पास एक मोबाइल फ़ोन है। उच्च-आय वाले देशों में यह आँकड़ा 95 प्रतिशत से अधिक है जबकि निम्न-आय वाले देशों में घटकर 57 फ़ीसदी ही रह जाता है।
उच्च और निम्न आय वाले देश
रिपोर्ट बताती है कि उच्च-आय वाले देशों में 93 फ़ीसदी आबादी द्वारा इंटरनेट का इस्तेमाल किया जाता है वहीं, निम्न-आय वाले देशों में यह आँकड़ा केवल 32 प्रतिशत है।
लैंगिक हिस्सेदारी
पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या में 0.94 प्रतिशत की वृद्धि हुई है मगर इसके बावजूद विश्व भर में 79 प्रतिशत पुरुष और 74 फ़ीसदी महिलाएँ, इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं।
यूज़र्स की आयु
शेष जनसंख्या की तुलना में युवा आबादी इंटरनेट से कहीं अधिक इस सुविधा से जुड़ी हुई है। आंकड़े बताते हैं कि 15 से 24 वर्ष आयु वर्ग में 86 फ़ीसदी युवा इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं। शेष आबादी के लिए यह आँकड़ा 74 प्रतिशत है।
शहर और गांव
इंटरनेट प्रयोग और शहरी-ग्रामीण इलाके में भी बड़ी दरार देखने को मिलती है। वैश्विक स्तर पर 82 फ़ीसदी शहरी निवासियों की इंटरनेट तक पहुँच है, जबकि ग्रामीण इलाक़ों में यह घटकर 63 प्रतिशत ही रह जाता है।
नैटवर्क कवरेज
आज भी विश्व की 97 फ़ीसदी आबादी 3जी नैटवर्क के दायरे में रहती है। दूसरी तरफ अन्य आधुनिक टैक्नॉलॉजी की कवरेज की बात करें तो यहाँ भी असमानता साफ देखी जा सकती है। फ़िलहाल वैश्विक आबादी के 59 प्रतिशत तक ही 5जी नैटवर्क की पहुँच है। नैटवर्क कवरेज की असमानता से जुड़ा एक और आंकड़ा बताता है कि उच्च-आय वाले देशों में 86 प्रतिशत जबकि निम्न-आय वाले देशों में केवल चार फ़ीसदी लोगों तक इसकी पहुँच है।
मासिक इस्तेमाल
मोबाइल के उपयोग से संबंधित आंकड़ों में बड़ा अंतर देखा जा सकता है। उच्च-आय वाले देशों में एक महीने के दौरान, मोबाइल ब्रॉडबैंड ट्रैफ़िक को प्रति ग्राहक 20 जीबी आंका गया है जबकि निम्न-आय वाले देशों के लिए इसका मासिक उपभोग 3.4 जीबी है। इस प्रकार से उच्च और निम्न आय वालों के मध्य इसका अंतर लगभग छह गुना का है।
व्यय क्षमता
डेटा का इस्तेमाल करने वाले मोबाइल इंटरनेट पैकेज की बात करें तो वर्तमान में इसकी वैश्विक औसत क़ीमत घटकर अब प्रति व्यक्ति, औसत राष्ट्रीय आय का 1.2 प्रतिशत रह गई है। वहीं फ़िक्स्ड ब्रॉडबैंड जिनमे घर और कार्यालय में लगाए जाने वाले स्थाई कनेक्शन आते हैं, उनकी क़ीमत घटकर प्रति व्यक्ति औसत राष्ट्रीय आय का 2.3 फ़ीसदी है।
डिजिटल खाई
यूएन एजेंसी का मानना है कि इंटरनेट के इस्तेमाल में डिजिटल खाई को पाटने की दिशा में प्रगति हुई है, लेकिन अब भी यह बड़े पैमाने पर व्याप्त है।
संख्या बढ़ी है मगर कम
रिपोर्ट बताई है कि बीते एक साल में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या में 20 करोड़ की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है, और इंटरनेट की सार्वभौमिक सुलभता की दिशा में प्रगति भी हुई है। इसके बावजूद दो अरब लोगों का आज भी इसकी पहुँच से दूर होना एक विशाल डिजिटल दरार के संकेत देता है।
यूएन एजेंसी की महासचिव डॉरीन बॉगडन मार्टिन कहती हैं कि एआई के दौर में, ऑफ़लाइन होने का अर्थ है, शिक्षा से रोज़गार तक अनगिनत अवसरों से दूर हो जाना। उनके अनुसार आज हमें कनेक्टिविटी के दायरे में विस्तार करने और इसे हर स्थान पर, हर किसी के लिए सार्थक बनाने की पहले से कहीं अधिक आवश्यकता है।
ये आंकड़े बताते हैं कि विश्व की तीन चौथाई आबादी अपने दैनिक जीवन में इंटरनेट को शामिल कर चुकी है, जिसने उनके लिए सूचना, शिक्षा, रोज़गार, व्यापार व आवश्यक सेवाओं के द्वार खोल दिए हैं। मगर दूसरी ओर हर चार में से लगभग एक व्यक्ति यानि दो अरब लोग अब भी इन अवसरों व कनेक्टिविटी से वंचित हैं।