चौथी सदी बीसी में तमिलनाडु का एक खुशहाल तटीय नगर था पोम्पुहार- आर्कियोलॉजिकल सर्वे

तमिलनाडु के इतिहास की बात हो और पुराने तटीय शहर पोम्पुहार का ज़िक्र का किया जाए, ऐसा मुमकिन ही नहीं। तमिलनाडु का आर्कियोलॉजिकल सर्वे बताता है कि पोम्पुहार चौथी सदी बीसी में एक खुशहाल तटीय नगर हुआ करता था। यह शहर एक समय चोल शासकों की राजधानी रहा है।

बीबीसी की एक रिपोर्ट बताती है उत्तर भारत के भरहुत में दूसरी सदी बीसीई का एक बौद्ध स्तूप है। ‘पोम्पुहार अंडरवाटर एक्सकेवेशन म्यूज़ियम गाइड’ के अनुसार, पोम्पुहार को ‘कागंती’ भी कहा जाता है, जबकि स्तूप के लिए सोमा नाम के एक व्यक्ति के दान का भी ज़िक्र है।

तमिलनाडु के आर्कियोलॉजिकल डिपार्टमेंट के सलाहकार प्रोफेसर के राजन कहते हैं, ‘संगम लिटरेचर और कई किताबों में पोम्पुहार के कई ज़िक्र हैं। हालांकि, पक्के और साइंटिफिक नतीजों तक पहुँचने के लिए और ज़्यादा डिटेल में खुदाई की जा रही है।’

खबर के अनुसार, भारत के तमिलनाडु राज्य के मयिलादुथुराई ज़िले के पोम्पुहार में पिछले दो हफ़्तों से समुद्र की गहराई में खुदाई चला। तमिलनाडु आर्कियोलॉजिकल डिपार्टमेंट की खुदाई 6 सितंबर को शुरू हुई थी और 22 सितंबर को पूरी हुई। आर्कियोलॉजिस्ट के मुताबिक, खुदाई के दौरान पोम्पुहार के समुद्री इलाके में 250 से ज़्यादा कलाकृतियां मिली हैं।

तमिलनाडु के आर्कियोलॉजिकल डिपार्टमेंट के मुताबिक, पोम्पुहार में रिसर्च का काम 1910 में शुरू हुआ था। बाद में, 1963-64 में, पोम्पुहार के पलावनेश्वरम इलाके में एक बौद्ध मठ मिला।

इसके बाद, 1995-96 में, मणिकाराम कलरवल्ली में हुई खुदाई के दौरान एक पुरानी नाव घाट के अवशेष मिले। वहां मिट्टी से बने बुद्ध के पैरों के निशान भी मिले।

इसके अलावा, रोमन स्टाइल के मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े भी मिले, जिन पर पत्तों, पक्षियों, घोड़ों और नावों की तस्वीरें बनी थीं। रिसर्चर्स के मुताबिक, यह पुराना नावखाना शायद चौथी शताब्दी बीसी का है।

समुद्र तल पर पहले की गई खुदाई के दौरान, पुरानी इमारतों के निशान और काले और लाल मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े भी मिले थे। रिसर्चर्स का कहना है कि अब तक की गई आर्कियोलॉजिकल जांच से पक्का सबूत मिलता है कि पोम्पुहार एक असली शहर था। हालांकि, अभी भी इस बात का कोई पक्का नतीजा नहीं निकला है कि शहर का कितना हिस्सा तबाह हुआ, कब हुआ, और क्या यह धीरे-धीरे हुआ या कोई एक घटना थी।

खबर में प्रोफेसर के राजन कहते हैं, ‘शायद पोम्पुहार का लगभग दो-तिहाई हिस्सा पानी में डूब गया था। यह जानना बहुत ज़रूरी है कि शहर का इतना बड़ा हिस्सा समुद्र के नीचे कैसे चला गया। हमें यह भी देखना होगा कि क्या यह समुद्र का लेवल बढ़ने की वजह से हुआ। यह तो रिसर्च की बस शुरुआत है।’

पोम्पुहार, जिसे पुराने समय में कावेरी पोम्पुहार कहा जाता था, का ज़िक्र संगम साहित्य की मशहूर रचनाओं में विस्तार से मिलता है। संगम साहित्य में पोम्पुहार का ज़िक्र ऊँची इमारतों और विष्णु, शिव, बौद्ध और जैन धर्म के बड़े मंदिरों वाले शहर के तौर पर किया गया है।

पोम्पुहार करीब चार कदम के इलाके में फैला हुआ था। एक कदम लगभग 7.5 km का होता है, और यह पुराना शहर 30 km के एरिया में फैला हुआ था। मशहूर संगम कविता पट्टिनपलाई में लिखा है कि कावेरी पोम्पटनम (पोम्पुहार का दूसरा नाम) कावेरी नदी के उत्तरी किनारे पर बसा था।

रिपोर्ट में कहा गया है कि पट्टिनपलाई में यह भी लिखा है कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से आने वाला सामान पोम्पुहार में बिक्री के लिए रखा जाता था। इनमें उत्तर के पहाड़ों से सोना और रत्न, पश्चिम से चंदन और ऊद, दक्षिण के समुद्र से मोती, गंगा इलाके से सामान, कावेरी इलाके में बनने वाला सामान, श्रीलंका से अलग-अलग प्रोडक्ट पोम्पुहार पहुँचते थे। इन सामानों की वजह से शहर का बाज़ार बहुत बड़ा और चहल-पहल वाला था।

इस बारे में जानकारी तमिलनाडु आर्कियोलॉजिकल डिपार्टमेंट की तरफ से पब्लिश की गई ‘पोम्पुहार अंडरवाटर एक्सकेवेशन म्यूज़ियम गाइड’ में दी गई है। पोम्पोहर में दिन-रात बाज़ार खुले रहते थे और वहाँ व्यापार चलता रहता था। इन बाज़ारों को ‘नलंगडी’ (दिन का बाज़ार) और ‘अलंगडी’ (रात का बाज़ार) कहा जाता था। शहर के कमर्शियल इलाके को ‘पट्टिनपक्कम’ के नाम से जाना जाता था, जबकि अमीर लोगों के रहने वाले इलाके को ‘मारुवरपक्कम’ के नाम से जाना जाता था।

इस शहर को अलग-अलग समय पर कावेरी पोम्पुहार, काकांति, संबापति, पालपोग्गा माथुर, मन्नागटू वनपति, चोलापट्टनम, कावेरी एम्पोरियम और कोलापट्टनम जैसे कई नामों से भी जाना जाता था।

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