एक स्टडी में यह बात सामने आई है कि अगर पारंपरिक खेती को बढ़ावा दिया जाए तो ग्रेट इंडियन बस्टर्ड दक्षिण में अपने पुराने इलाके में फिर से बस सकता है। ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को भारतीय तिलोर या सोन चिरैया के नाम से जाना जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम Ardeotis nigriceps है।
वाइल्डलाइफ़ इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया के रिसर्चर्स ने लैंडस्केप-लेवल सर्वे और प्रजातियों के फैलाव की मॉडलिंग करके 16 अहम जगहों को प्राथमिकता वाले संरक्षण क्षेत्रों के तौर पर पहचाना है। एक नई स्टडी से पता चला है कि अगर पारंपरिक और कम-तीव्रता वाली खेती को फिर से शुरू किया जाए, तो गंभीर रूप से लुप्तप्राय ग्रेट इंडियन बस्टर्ड दक्षिण के कुछ हिस्सों में फिर से बस सकता है।
स्टडी के मुताबिक, अगर पारंपरिक खेती और ज़मीन के इस्तेमाल के तरीकों को अपनाया जाए, तो इसके वहाँ फिर से बसने की संभावना है। गौरतलब है कि गंभीर रूप से लुप्तप्राय ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (GIB) भारतीय उपमहाद्वीप, खासकर दक्षिण के पठार के ज़्यादातर हिस्सों से गायब हो चुका है।
यह पेपर 14 अगस्त को PLOS One जर्नल में प्रकाशित हुआ है। ‘इन सर्च ऑफ़ सेफ़ हेवेन्स: आइडेंटिफ़ाइंग प्रायोरिटी कंज़र्वेशन एरियाज़ फ़ॉर अ क्रिटिकली एंडेंजर्ड बर्ड, द ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, इन द दक्कन लैंडस्केप ऑफ़ इंडिया’ शीर्षक वाले इस पेपर को वाइल्डलाइफ़ इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया के वाइल्डलाइफ़ बायोलॉजिस्ट शाहीर खान, गौतम तालुकदार और बिलाल हबीब ने लिखा है।
रिसर्चर्स ने दक्कन लैंडस्केप में GIB के लिए एक प्रोबेबिलिटी डिस्ट्रिब्यूशन मैप (संभावित फैलाव का नक्शा) तैयार किया और प्राथमिकता वाले संरक्षण क्षेत्रों की पहचान की। स्टडी में पाया गया कि दक्कन लैंडस्केप के 7,20,000 वर्ग किलोमीटर इलाके में से, पर्यावरण और जलवायु से जुड़े अलग-अलग कारकों के आधार पर सिर्फ़ 48,000 वर्ग किलोमीटर (6.6 प्रतिशत) हिस्सा ही इस प्रजाति के लिए उपयुक्त था।
लैंडस्केप-लेवल सर्वे और प्रजातियों के फैलाव की मॉडलिंग करके 16 अहम जगहों को भी प्राथमिकता वाले संरक्षण क्षेत्रों के तौर पर पहचाना गया, जिनका कुल क्षेत्रफल 18,000 वर्ग किलोमीटर था और जो 144 से 8,496 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैले थे।
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को इंटरनेशनल यूनियन फ़ॉर कंज़र्वेशन ऑफ़ नेचर (IUCN) की रेड लिस्ट के अनुसार गंभीर रूप से लुप्तप्राय प्रजाति में रखा गया है। अभी के अनुमान के मुताबिक, इनकी आबादी 100 से 150 के बीच है। यह ज़मीन पर रहने वाला एक बड़ा पक्षी है जो मुख्य रूप से भारत के सूखे और अर्ध-शुष्क घास के मैदानों में पाया जाता है। कभी यह भारत के 11 राज्यों और पाकिस्तान के कुछ हिस्सों (ज़्यादातर दक्षिणी) में पाया जाता था। 19वीं सदी के आखिर में इनकी आबादी तेज़ी से घटी।
पेपर में बताया गया है, इसकी आबादी में भारी गिरावट देखी गई है जिसमे दक्षिणी इलाके को सबसे ज़्यादा प्रभावित क्षेत्रों में से एक माना गया है। इस इलाके में जीआईबी की आबादी का पिछला अनुमान 1989 में 200-390 था, जो 2008 में घटकर 66-75 रह गया है।
इसकी सबसे बड़ी आबादी राजस्थान में है, और बाकी राज्यों – गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में 10-15 पक्षी हैं। यह पक्षी भारत के उत्तरी हिस्सों से पूरी तरह गायब हो चुका है और महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश (दक्षिणी इलाके) में मौजूद आबादी के स्थानीय स्तर पर खत्म होने का बड़ा खतरा है।
पेपर लेखकों के अनुसार, जीआइबी की संख्या में कमी मुख्य रूप से रहने की जगह (हैबिटैट) के खत्म होने, तेज़ी से बढ़ते सिंचाई नेटवर्क, पारंपरिक खेती के तरीकों में बदलाव और इनके इलाकों में इंसानी गतिविधियों के बढ़ने के कारण हुई है।
पेपर में कहा गया है, “इस इलाके में खेती की ज़मीन में तेज़ी से बदलाव हो रहा है और इंसानी गतिविधियों की वजह से घास के मैदानों (ग्रासलैंड) का बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ है। इसके अलावा, किसान दालों और तिलहन की पारंपरिक खेती छोड़कर नकदी फसलों (कैश क्रॉप) की खेती की ओर बढ़ रहे हैं।”
जानकारी में यह भी कहा गया है कि घास के मैदानों और झाड़ीदार इलाकों को खेती की ज़मीन में बदलने और पेड़ लगाने के अभियानों में इनके इस्तेमाल ने इन इकोसिस्टम को विकास परियोजनाओं के लिए मुख्य लक्ष्य बना दिया है। कीटनाशकों का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल, जानवरों का ज़रूरत से ज़्यादा चरना (ओवरग्रेज़िंग), शहरीकरण, आवारा कुत्तों की आबादी और बिजली की लाइनों का विस्तार भी इसकी आबादी को कम करने का कारण बने हैं।