डिजिटल अरेस्ट को अलग अपराध बनाने पर केंद्र विचार करे: सुप्रीम कोर्ट

इस समय सीबीआई 10 करोड़ रुपये या उससे अधिक की धोखाधड़ी वाले लगभग 20 बड़े डिजिटल फ्रॉड मामलों की जांच कर रहा है, जबकि अन्य मामलों की जांच राज्य पुलिस कर रही है।


बीते दिन देश की शीर्ष अदालत केंद्र सरकार से कहा कि वह डिजिटल अरेस्ट को आपराधिक कानून में औपचारिक रूप से परिभाषित करने और इसे सख्त सजा के साथ अलग अपराध घोषित करने पर विचार करे।

साइबर क्राइम की दुनिया से उपजे डिजिटल अरेस्ट में पीड़ितों को बंधक बनाकर पैसे देने का दबाव बनाते हैं। इस तरह के साइबर अपराध में जालसाज कानून लागू करने वाले अधिकारियों, अदालती कर्मचारियों या सरकारी एजेंसियों के कर्मियों के रूप में उपस्थित होते हैं और बंधक को ऑडियो और वीडियो कॉल के जरिए दहशत दिलाकर दबाव बनाते हैं।

देश के प्रमुख न्यायाधीश सूर्यकांत सहित जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच ने कहा है कि ऐसे मामलों में आरोपी के खिलाफ ठोस सबूतों के आधार पर राय बनने के बाद उसकी संपत्ति को फ्रीज किया जा सकता है।

जानकारी के मुताबिक़, गृह मंत्रालय ने विशेष सचिव (आंतरिक सुरक्षा) की अध्यक्षता में एक IDC बनाई गई है।सीबीआई द्वारा अदालत को दी गई जानकारी में कहा गया है कि इस तरह के घोटाले अक्सर संगठित और अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराध सिंडिकेट द्वारा किए जाते हैं। ऐसे में अब एजेंसी अंतरराष्ट्रीय मॉड्यूल को खत्म करने के लिए इंटरपोल चैनलों का उपयोग कर रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, इस बारे में अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने बताया कि डिजिटल अरेस्ट को पहले से ही कानून में परिभाषित किया जा चुका है। अदालत को जानकारी देते हुए उनका कहना था कि, सिस्टम में कमियों की पहचान करने के लिए एक अंतर-विभागीय समिति डिटेल्ड रिपोर्ट को अंतिम रूप दे रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, डीपफेक के खतरे पर बात करते हुए जस्टिस बागची ने कहा कि ऐसे उभरते ऑनलाइन अपराधों को परिभाषित करने के लिए सरकार को पहल करना चाहिए। आगे उन्होंने कहा कि डीपफेक के मौजूदा कानून को और बेहतर बनाने की जरूरत है। उन्होंने बताया कि आर्टिकल 142 के तहत हम किसी अपराध को परिभाषित नहीं कर सकते।

सीजेआई ने कानून में डिजिटल अरेस्ट को औपचारिक रूप से परिभाषित करने की जरूरत है। इसमें जबरन वसूली और डकैती भी शामिल हैं। इसे गंभीर परिणामों वाले एक अलग अपराध के रूप में परिभाषित करना चाहिए। यह प्रावधान भी हो कि जब आरोपी के खिलाफ कुछ सबूत मिल जाएं तो उसकी संपत्ति फ्रीज की जा सके।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार डीपफेक और डिजिटल अरेस्ट से निपटने के लिए कानून पर काम कर रही है। एक ड्राफ्ट बिल तैयार किया जा रहा है, जो संभवतः डिजिटल अरेस्ट, डीपफेक और अन्य ऑनलाइन अपराधों को कवर करेगा। बेंच का कहना है कि आज इस मामले में निर्देश पारित किया जाएगा।

मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि गृह मंत्रालय की ओर से कोर्ट को सूचित किया था कि उसने कमियों को दूर करने और साइबर अपराध पीड़ितों के लिए वास्तविक समय में सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक उच्च स्तरीय अंतर-विभागीय समिति का गठन किया है।

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