रोज़ाना के सोशल मामलों में एआई टूल्स पर बढ़ रही है युवाओं की निर्भरता

डिजिटल टेक्नोलॉजी के आगे बढ़ने के साथ मनोवैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि यह युवाओं के सामाजिक रिश्तों को कैसे प्रभावित करती है और कैसे सार्थक और स्वस्थ दोस्ती बनाए रखी जा सकती है।

हाल की स्टडीज़ के मुताबिक, बहुत सारे युवा और टीनएजर रोज़ाना के सोशल इंटरैक्शन और पर्सनल बातचीत के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसमें लगभग 20 प्रतिशत युवा रिलेशनशिप सलाह और इमोशनल सपोर्ट के लिए एआई चैटबॉट का इस्तेमाल कर रहे हैं। रिसर्च के मुताबिक, युवा मुश्किल टेक्स्ट मैसेज लिखने, असहज बातचीत की प्रैक्टिस करने और अलग-अलग सोशल सिचुएशन को समझने के लिए एआई टूल्स का इस्तेमाल कर रहे हैं।

आजकल युवाओं की ज़्यादातर दोस्ती डिजिटल और असल ज़िंदगी, दोनों जगहों पर होती है, जिससे “ऑनलाइन” और “ऑफ़लाइन” दोस्ती के बीच का फ़र्क़ अब लगभग खत्म हो गया है। प्यू रिसर्च सेंटर के अनुसार, अमरीका के लगभग सभी टीनएजर्स (13 से 17 साल के 95%) के पास स्मार्टफोन है, लगभग आधे (47%) का कहना है कि वे हर समय ऑनलाइन रहते हैं, और 85% वीडियो गेम खेलते हैं।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने आधुनिक दोस्ती में एक नया और उलझन भरा पहलू जोड़ दिया है। कई टीनएजर्स पढ़ाई में मदद, मनोरंजन और यहाँ तक कि इमोशनल सपोर्ट के लिए भी एआई चैटबॉट्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। जबकि इसके लिए बहुत कम नियम या सुरक्षा उपाय मौजूद हैं। जैसे-जैसे डिजिटल टेक्नोलॉजी आगे बढ़ रही है, मनोवैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि यह युवाओं के सामाजिक रिश्तों को कैसे प्रभावित करती है और कैसे सार्थक और स्वस्थ दोस्ती बनाए रखी जा सकती है।

एक्सपर्ट्स का कहना है कि कई युवा इन डिजिटल असिस्टेंट को मुश्किल इंसानी रिश्तों से निपटने का कम स्ट्रेस वाला तरीका मानते हैं। वही रिपोर्ट बताती है कि कई युवा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से बात करना पसंद करते हैं क्योंकि यह हमेशा उपलब्ध रहता है और रिजेक्शन के डर से भी बचाव करता है।

क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट जोशुआ गुडमैन के मुताबिक, एआई चैटबॉट से बात करने से युवाओं को एक सुरक्षित माहौल मिलता है जहाँ वे उन विषयों पर बात कर सकते हैं जिन पर उन्हें अपने माता-पिता या दूसरे करीबी लोगों से बात करना मुश्किल लगता है।

इन सबके बावजूद एक्सपर्ट्स जिस बात को लेकर सबसे अधिक चिंतित हैं, वह यह है कि दी है कि डिजिटल चैटबॉट असली इंसानी हमदर्दी और रिश्तों की जगह नहीं ले सकते। क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट मैरी एल्वर्ड के अनुसार, सुरक्षित महसूस करना असली सुरक्षा जैसा नहीं है, क्योंकि चैटबॉट के साथ बातचीत स्टोर होती है और उसे एनालाइज़ किया जा सकता है।

मीडिया साइकोलॉजिस्ट डॉन ग्रांट का कहना है कि चैटबॉट में यूज़र को चुनौती देने या अलग राय देने की क्षमता नहीं होती है, जिससे असल ज़िंदगी में सोशल स्किल्स के विकास पर असर पड़ सकता है।

इस मुद्दे पर हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि युवाओं को असली दोस्तों और परिवार के कनेक्शन की जगह पूरी तरह से एआई पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। उनके अनुसार, रोज़मर्रा की ज़िंदगी में लोगों से सीधी बातचीत करना अभी भी भरोसा, असरदार कम्युनिकेशन और मज़बूत इमोशनल रिश्ते बनाने के लिए ज़रूरी है।

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